अनहद नाद

August 29, 2006

राजकिशोर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:42 pm

अच्छा

 

 

सुबह-सुबह की हवा सुहानी

और   शाम  की    धूप

आंखों को जो शीतल कर दे

सुंदर  है  वह   रूप

 

वर्षा अच्छी रिमझिम-रिमझिम

ज्यों  प्रिय  का   संदेश

देश वही अच्छा जो लगता

नहीं  कभी    परदेश ।

कुंवर नारायण की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:29 pm

 

दीवारें

 

 

अब मैं एक छोटे-से घर

और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूं

 

कभी मैं एक बहुत बड़े घर

और छोटी-सी दुनिया में रहता था

 

कम दीवारों से 

बड़ा फ़र्क पड़ता है

 

दीवारें न हों

तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर ।

August 22, 2006

नरेश सक्सेना की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:37 pm

 नरेश सक्सेना

घास

 

बस्ती वीरानों पर यकसां फैल रही है घास

उससे पूछा क्यों उदास हो कुछ तो होगा खास

कहां गए सब घोड़े अचरज में डूबी है घास

घास ने खाए घोड़े या घोड़ों ने खाई घास

सारी दुनिया को था जिनके कब्जे का अहसास

उनके पते ठिकानों तक पर फैल चुकी है घास

धरती पानी की  जाई    सूरज की खासमखास

फिर भी कदमों तले बिछी कुछ कहती है यह घास

धरती भर भूगोल घास का  तिनके भर इतिहास

घास से पहले, घास यहां थी, बाद में होगी घास ।

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

August 17, 2006

भगवत रावत की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:02 pm

 

 वे इसी पृथ्वी पर हैं

 

कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं जरूर

जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर

कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं

बचाए हुए हैं उसे

अपने ही नरक में डूबने से

वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं

इतने नामालूम कि कोई उनका पता

ठीक-ठीक बता नहीं सकता

उनके अपने नाम हैं लेकिन वे

इतने साधारण और इतने आमफ़हम हैं

कि किसी को उनके नाम

सही-सही याद नहीं रहते

उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे

एक-दूसरे में इतने घुले-मिले रहते हैं

कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता

वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं

और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है

और सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हें

रत्ती भर यह अन्देशा नहीं

कि उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है यह पृथ्वी ।

August 16, 2006

आत्मा का राग

Filed under: Blogroll — PRIYANKAR @ 10:56 am

  ज्ञान के अन्य अनुशासनों की तरह कविता भी  जीवन को समझने का एक उपक्रम है,  अलबत्ता अधिक आनंदप्रद उपक्रम । कविता में मन को रंजित करने का तत्व होता है पर कविता प्रचलित अर्थों में मनोरंजन की विधा नहीं है। कविता हमारे अंतर्जगत को आलोकित करती है । वह भाषा  की स्मृति है । खांटी दुनियादार लोगों की जीवन-परिधि में कविता कदाचित विजातीय तत्व हो सकती है, पर कविता के लोकतंत्र में रहने वाले सहृदय सामाजिकों के लिये  कविता –  सोशल इंजीनियरिंग का — प्रबोधन का मार्ग है । कविता मनुष्यता की पुकार है ।  प्रार्थना का सबसे बेहतर तरीका । जीवन में जो कुछ सुघड़ और सुन्दर है कविता उसे बचाने का सबसे सशक्त माध्यम है । कठिन से कठिन दौर में भी कविता हमें प्राणवान रखती है और सीख देती है कि कल्पना और सपनों का संसार अनंत है ।

  कविता एक किस्म का सामाजिक संवाद है । पर यह संवाद इधर कुछ एकपक्षीय-सा हो चला है ।  कवि और पाठक/श्रोता के बीच  एक किस्म की  संवादहीनता की स्थिति  बनती दिख रही है । यह अबोलापन निश्चित रूप से  कविता के इलाके को — उसके प्रभाव-क्षेत्र को –  सीमित कर रहा है ।  यह सच है कि कोई भी नकली सभ्यता कविता से उसके रंग,ध्वनियां और संकेत नहीं छीन सकती। पर इधर कविता पर कुछ नए दबाव बन रहे हैं। कविता की लोकप्रियता और प्रभावकारिता के बारे में पहले भी कई रोचक बहसें हो चुकी हैं । अतः इस चिट्ठे का उद्देश्य काव्य-विमर्श मात्र नहीं है । यह चिट्ठा हिंदी कविता तथा हिंदी में अनूदित अन्य भारतीय  और विदेशी भाषाओं की अनूठी कविताओं का प्रतिनिधि काव्य-मंच बनने का आकांक्षा-स्थल है —  सभी काव्यप्रेमियों का आत्मीय संवाद-स्थल जहां बेहरीन कविताएं तो होंगी ही , साथ ही होंगी उन कविताओं पर आपकी सुचिंतित टिप्पणियां ।

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