अनहद नाद

August 22, 2006

नरेश सक्सेना की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:37 pm

 नरेश सक्सेना

घास

 

बस्ती वीरानों पर यकसां फैल रही है घास

उससे पूछा क्यों उदास हो कुछ तो होगा खास

कहां गए सब घोड़े अचरज में डूबी है घास

घास ने खाए घोड़े या घोड़ों ने खाई घास

सारी दुनिया को था जिनके कब्जे का अहसास

उनके पते ठिकानों तक पर फैल चुकी है घास

धरती पानी की  जाई    सूरज की खासमखास

फिर भी कदमों तले बिछी कुछ कहती है यह घास

धरती भर भूगोल घास का  तिनके भर इतिहास

घास से पहले, घास यहां थी, बाद में होगी घास ।

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

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