नरेश सक्सेना की एक कविता

घास
बस्ती वीरानों पर यकसां फैल रही है घास
उससे पूछा क्यों उदास हो कुछ तो होगा खास
कहां गए सब घोड़े अचरज में डूबी है घास
घास ने खाए घोड़े या घोड़ों ने खाई घास
सारी दुनिया को था जिनके कब्जे का अहसास
उनके पते ठिकानों तक पर फैल चुकी है घास
धरती पानी की जाई सूरज की खासमखास
फिर भी कदमों तले बिछी कुछ कहती है यह घास
धरती भर भूगोल घास का तिनके भर इतिहास
घास से पहले, घास यहां थी, बाद में होगी घास ।
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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार
अच्छी लगी
Comment by pratyaksha26 — August 23, 2006 @ 4:17 am
प्रियंकर भाई,
स्वागत है। चिट्ठा बहुत सुन्दर दिख रहा है।
लगे रहिए, लगातार लिखते रहिए।
वो कहते है ना बूंद बूंद से भरता सागर
(आपका एक लेख, ‘वैब पर हिन्दी’ के सागर असीम योगदान करेगा।)
Comment by Jitu — August 23, 2006 @ 9:29 am
नमस्ते प्रियँकर जी,दोनो कवितायेँ रुचिकर हैँ.आशा है आगे भी बेहतर कवितायेँ पढने को मिलती रहेँगी.
Comment by Rachana — August 28, 2006 @ 8:33 am
प्रत्यक्षा,जीतू भाई और रचना — आप सभी ने हिम्मत बढाई सो बहुत-बहुत शुक्रिया . आशा है आप समय-समय पर ‘अनहदनाद’ पर आते रहेंगे और इसे अपने प्रिय चिट्ठों की सूची में स्थान देंगे .
Comment by प्रियंकर — October 5, 2006 @ 6:50 am