अनहद नाद

September 5, 2006

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 12:06 pm

Leeladhar Jagoori 

मेरा ईश्वर

 

मेरा ईश्वर मुझसे नाराज़ है

क्योंकि मैंने दुखी न रहने की ठान ली

 

मेरे देवता नाराज़ हैं

क्योंकि जो ज़रूरी नहीं है

मैंने त्यागने की कसम खा ली है

 

न दुखी रहने का कारोबार करना है

न सुखी रहने का व्यसन

मेरी परेशानियां और मेरे दुख ही

ईश्वर का आधार क्यों हों ?

 

पर सुख भी तो कोई नहीं है मेरे पास

सिवा इसके कि दुखी न रहने की ठान ली है ।

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