मेरा ईश्वर
मेरा ईश्वर मुझसे नाराज़ है
क्योंकि मैंने दुखी न रहने की ठान ली
मेरे देवता नाराज़ हैं
क्योंकि जो ज़रूरी नहीं है
मैंने त्यागने की कसम खा ली है
न दुखी रहने का कारोबार करना है
न सुखी रहने का व्यसन
मेरी परेशानियां और मेरे दुख ही
ईश्वर का आधार क्यों हों ?
पर सुख भी तो कोई नहीं है मेरे पास
सिवा इसके कि दुखी न रहने की ठान ली है ।
बहुत अच्छी कविता
By: pratyaksha26 on September 6, 2006
at 5:21 am
धन्यवाद प्रत्यक्षा .
जगूड़ी जी की एक और प्रसिद्ध कविता है : ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’ . उसे जरूर पढना . लाजबाब कविता है जो उनके इसी नाम के संकलन में है . अभी पिछले महीने की १९ से २२ तारीख के बीच वे कोलकाता में हमारे साथ थे . बेहद ज़िंदादिल इंसान है. हमने उन्हें अपने संस्थान में ‘कविता का आत्मवृत्त अर्थात काव्य और भाषा का अंतर्संबंध’ विषय पर स्वर्ण जयंती व्याख्यान देने तथा काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया था . कार्यक्रम बेहद सफल रहा .
आशा है ‘अनहदनाद’ की ओर आना होता रहेगा .
By: प्रियंकर on October 5, 2006
at 7:48 am