अनहद नाद

October 19, 2006

प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं !

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:59 am

तमसो मा ज्योतिर्गमय

 

पुकारें आंधियां चाहे

प्रभंजन मत्त सा डोले

क्षणों को लौ बनाता

ज्वालशिल्पी दीप यों बोले

थकन कैसी पराजय क्या

हमें अब रात का भय क्या !
                                               ( महादेवी वर्मा )    

  

       दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

                               –    प्रियंकर पालीवाल

                                                   

                           

October 17, 2006

प्रियंकर की एक प्रेम कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:14 am

तुम मेरे मन  का कुतुबनुमा हो

 

भले किसी और की हो जाएं

ये गहरी काली आंखें

वे सितारे मेरी स्मृति के अलाव में

रह-रह कर चमकते रहेंगे जो

उस छोटी-सी मुलाकात में

चमके थे तुम्हारी आंखों में

 

भटकाव के बीहड़ वन में

वे ही होंगे पथ-संकेतक

गहन अंधियारे में

दिशासूचक ध्रुवतारा

तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो

अभौतिक अक्षांसों के

अलौकिक फेरे

संभव नहीं हैं तुम्हारे बिना

 

जीवन लालसा के तट पर

हांफ़ते रहने का नाम नहीं

किंतु अब निर्वाण भी

प्राथमिकता में नहीं है

 

मोक्ष के बदले

रहना चाहता हूं

तुम्हारी स्मृति के अक्षयवट में

पर्णहरित की तरह

 

स्नेह की वह सुनहरी लौ

नहीं चाहता –  नहीं चाहता

वह बेहिसाब उजाला

अब तुम्हें पाने की

कोई आकांक्षा शेष नहीं

 

जगत-जीवन के

कार्य-व्यापार में

प्रेम का तुलनपत्र

अब कौन देखे !

 

अपने अधूरे प्रेम के

जलयान में शांत मन

चला जाना चाहता हूं

विश्वास के उस अपूर्व द्वीप की ओर

जहां मेरी और तुम्हारी कामनाओं

के जीवाश्म विश्राम कर रहे हैं ।

 

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स्वाधीनता ( शारदीय अंक 2006 ) से साभार

[ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी का मुखपत्र ]

October 11, 2006

प्रियंकर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:42 am

सबसे बुरा दिन

 

सबसे बुरा दिन वह होगा

जब कई प्रकाशवर्ष दूर से

सूरज भेज देगा

‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल

यह अंधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा

 

पृथ्वी मांग लेगी

अपने नमक का मोल

मौका नहीं देगी

किसी भी गलती को सुधारने का

क्रोध में कांपती हुई कह देगी

जाओ तुम्हारी लीज़ खत्म हुई

यह भारत के भुज बनने का समय होगा

 

सबसे बुरा दिन वह होगा

जब नदी लागू कर देगी नया विधान

कि अबसे सभ्यताएं

अनुज्ञापत्र के पश्चात ही विकसित हो सकेंगी

अधिकृत सभ्यता-नियोजक ही

मंजूर करेंगे बसावट और

वैचारिक बुनावट के मानचित्र

यह नवप्रवर्तन की नसबंदी का दिन होगा

 

भारत और पाकिस्तान के बीच

विवाद का नया विषय होगा

सहस्राब्दियों से बाकी

सिंधु सभ्यता के नगरों को आपूर्त

जल के शुल्क का भुगतान

 

मुद्रा कोष के संपेरों की बीन पर

फन हिलाएंगी खस्ताहाल बहरी सरकारें

राष्ट्रीय गीतों की धुन तैयार करेंगे

विश्व बैंक के पेशेवर संगीतकार

आर्थिक कीर्तन के कोलाहल की पृष्ठभूमि में

यह बंदरबांट के नियम का अंतरराष्ट्रीयकरण होगा

 

शास्त्र हर हाल में

आशा की कविता के पक्ष में है

सत्ता और संपादक को सलामी के पश्चात

कवि को सुहाता है करुणा का धंधा

विज्ञापन युग में कविता और ‘कॉपीराइटिंग’ की

गहन अंतर्क्रिया के पश्चात

जन्म लेगी ‘विज्ञ कविता’

यह नई विधा के जन्म पर सोहर गाने का दिन होगा

 

सबसे बुरा दिन वह होगा

जब जुड़वां भाई

भूल जाएगा मेरा जन्म दिन

यह विश्वग्राम की

  नव-नागरिक-निर्माण-परियोजना का अंतिम चरण होगा ।            

 

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( समकालीन सृजन के नए अंक ‘कविता इस समय’ से साभार )

October 5, 2006

केदारनाथ सिंह की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:25 am

Kedarnath Singh 

हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान

(कवि मित्र के. सच्चिदानंदन के लिए)

 

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं

 

सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

 

पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिंदी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी

जो अंतिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में

 

कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

 

पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

 

तुम झांक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊंचे-ऊंचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !

 

मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं —      भाषा

भाषा —     भाषा —   सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

 

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूंद-बूंद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूं

तो कहीं गहरे

अरबी   तुर्की   बांग्ला   तेलुगु

यहां तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज भी

सब बोलता हूं जरा-जरा

जब बोलता हूं हिंदी

 

पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूं

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में ।

        

*****

  

साभार:  कविता इस समय

(समकालीन सृजन  का हिंदी कविता पर केन्द्रित विशेष अंक)

पृष्ठ संख्या : 408 ; मूल्य : 50/- रुपये मात्र (डाक खर्च अलग)

प्राप्ति स्थल :

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