अनहद नाद

October 5, 2006

केदारनाथ सिंह की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 6:25 am

Kedarnath Singh 

हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान

(कवि मित्र के. सच्चिदानंदन के लिए)

 

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं

 

सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

 

पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिंदी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी

जो अंतिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में

 

कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

 

पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

 

तुम झांक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊंचे-ऊंचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !

 

मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं —      भाषा

भाषा —     भाषा —   सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

 

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूंद-बूंद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूं

तो कहीं गहरे

अरबी   तुर्की   बांग्ला   तेलुगु

यहां तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज भी

सब बोलता हूं जरा-जरा

जब बोलता हूं हिंदी

 

पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूं

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में ।

        

*****

  

साभार:  कविता इस समय

(समकालीन सृजन  का हिंदी कविता पर केन्द्रित विशेष अंक)

पृष्ठ संख्या : 408 ; मूल्य : 50/- रुपये मात्र (डाक खर्च अलग)

प्राप्ति स्थल :

संपादक

समकालीन सृजन 

20,बालमुकुंद मक्कर रोड

कोलकाता-700 007

फोन नंबर : 033-2269 9944

                       09830411118

 

 

5 Comments »

  1. हिन्दी के दर्द तथा हिन्दी के प्रति प्रेम को सही रूपमें अभिव्यक्त करती कविता.

    Comment by संजय बेंगाणी — October 5, 2006 @ 11:59 am

  2. [...] प्रियंकर पेश कर रहे हैं प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह की एक मर्मस्पर्शी कविता पिछली रात मैंने एक सपना देखा कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं और हिंदी बोल रहे हैं फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी जो अंतिम सिक्के की तरह हमेशा बच जाती है मेरे पास हर मुश्किल में [...]

    Pingback by DesiPundit » Archives » मेरी भाषा के लोग — October 5, 2006 @ 1:27 pm

  3. बहुत ही सुंदर है आपने अपनी दिल की बात कवीता मे ढाला है - बहुत बढिया

    Comment by SHUAIB — October 6, 2006 @ 5:07 am

  4. प्रियंकर जी,
    मान गये हिन्‍दी के प्रति आपका लगाव बहुत खूबी से इस कविता में झलक पडती है…
    …हमारी जानिब से दाद कबूल फरमायें…शुक्रिया
    फिजा़

    Comment by Dawn — October 7, 2006 @ 1:18 am

  5. आपकी टिप्‍पणी रविंद्रनाथ टैगोर जी की कहावत के साथ वाकई बहुत अच्‍छी लगी
    बहुत गहरी बात समझा गये…उम्‍मीद है आगे भी आते रहेंगे..

    शुक्रिया
    फिजा़
    http://www.fizaa.blogspot.com

    Comment by Dawn — October 7, 2006 @ 1:24 am

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.