अनहद नाद

November 9, 2006

किताबनामा (साभार : वागर्थ, नवम्बर 2006)/ भाग-2

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आधी रात के रंग (कविता और चित्र संग्रह)  :  विजेन्द्र 

( कृतिओर प्रकाशन, सी-133, वैशाली नगर, जयपुर - 302021 , मूल्य : 495 रु.)

 

अंतरअनुशासनिकता का पराग/…2

प्रियंकर पालीवाल

काव्य संकलन ‘ आधी रात के रंग ‘ न केवल विजेन्द्र की काव्य-दृष्टि को पूरी तरह खोलकर हमारे सामने रखता है, वरन यह समूची प्रगतिशील काव्य-परम्परा के मानक तय करता है । एक स्तर पर यह संकलन लोकोन्मुखी परम्परा के एक चर्चित कवि की सौंदर्यशास्त्रीय मान्यताओं का घोषणापत्र भी है । एक मुक्त संवाद जिसमें कवि-चित्रकार-गायक परस्पर संवाद करते हैं, एक-दूसरे का समर्थन करते हैं तथा एक-दूसरे को सावधान-सावचेत भी करते हैं ।  संकलन की प्रथम कविता ‘कवि’ किसी कवि विशेष की आत्म छवि मात्र नहीं है, यह उस जन कवि का ‘मैनिफेस्टो’ है जिसे ऋग्वेद में मनीषी और ईश्वर कहा गया है । यह कविता समस्त कवि-कुल का जीवन गीत है :    

 ”एक मुक्त संवाद –
  आत्मीय क्षणों में कविता ही है
  जहां मैं –
  तुमसे कुछ छिपाऊं नहीं
  सुंदर चीजों को अमरता प्राप्त हो
  यही मेरी कामना है

  जबकि मनुष्य उच्च लक्ष्य के लिए
  प्रेरित रहें !
  हर बार मुझे तो खोना-ही-खोना है
  क्योंकि कविता को जीवित रखना
  कोई आसान काम नहीं
  सिवाय जीवन तप के ।
  x x x x x x x x x x x
  गाओ, गाओ……..ओ कवि ऐसा
  जिससे टूटे और निराश लोग
  जीवन को जीने योग्य समझें ।
  हृदय से उमड़े शब्द
  आत्मा का उजास कहते हैं ।
                                          (कवि)

 ’रंगो की स्वायत्तता’ कविता में कवि रंगों के संसार में प्रवेश करता है और वहां से अनुशासनिक हदबंदी को तोड़ते हुए संगीत के सुरीले इलाके में :

  रंगों की स्वायत्तता में भी
  कविता है –
  x x x x x x x x x x 
  रंग उन रूपकों की तरह हैं
  जो करते हैं कैन्वास को स्पंदित
  x x x x x x x x x x x x
  ……………….ओ रंगों
  दृश्य क्षितिज रचकर
  मुझे कविता की ऐसी संगति दो
  जहां मैं अपनी आत्मा का
  आरोह-अवरोह सुन सकूं ।

 ’गायक’ कविता में गायक को उसके दायित्व का बोध कराते हुए कवि कहता है :
  तुम वे गीत भी गाओ
  जो मनुष्य की यंत्रणाएं बताते हैं ।

‘मिथक का सच’ कविता में कवि स्वयं से भी यही अपेक्षा रखता है :

  ओ मेरे निजी गान
  तू दूसरों का भी बन
 एक सच्चा प्रगतिशील कवि परंपरा को किस तरह निरखता और परखता है, ‘आद्याशक्ति दुर्गा’ कविता इसका उत्कृष्ट उदाहरण है । ‘प्रकृति और मैं’  कविता पर्यावरण प्रदूषण पर एक जागरूक कवि की तीखी टिप्पणी है । ‘नागफणी’ में कवि परिवेश से कटे तथाकथित आधुनिकतावादियों के सौंदर्यबोध के छद्म को उघाड़कर सामने रखता है ।

 ’आधी रात के रंग’  काव्य-चत्र संग्रह एक ऐसे प्रगतिशील कवि की कविताओं और चत्रों का अनुपम संकलन है जो ‘अपनी जड़ों का बहुत ऋणी’ है और जिसकी कविताओं में देशज परंपराओं का भरपूर पोषक रस है । परस्पर आंतरिक संगति से युक्त इन चित्रों और कविताओं का अंतर्छंद एक है । अमूर्तन के बावजूद विजेन्द्र के चत्रों का सूक्ष्म अर्थ स्वयं प्रकाशित है । ‘आधी रात के रंग’ संकलन में दृढ़ इच्छा शक्ति और संश्लिष्ट जीवनबोध वाले दृष्टिवान कवि की ‘जीवन के तप और ताप की कविताएं’ तो हैं ही, उन कविताओं का बेहतरीन अंग्रेजी अनुवाद तथा सघन ऐन्द्रिकता से भरे-पूरे उनके बहुरंगी चित्र भी संग्रहीत हैं । यह संकलन इस विपन्न समय में समृद्धि का बोध करानेवाली आंतरिक रचनात्मक जुगलबंदी की अनुपम और विरल प्रस्तुति है। 

                                              ****************

                                  संपर्क : priyankarpaliwal@gmail.com

 

किताबनामा (साभार: वागर्थ,नवम्बर 2006)

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:59 am

           आधी रात के रंग (कविता और चित्र संग्रह)  :  विजेन्द्र

समीक्षा

 

अंतरअनुशासनिकता का पराग/…1

प्रियंकर पालीवाल 

 

भारतीय विचार परम्परा में काव्य का शुमार विद्या में और कला का वर्णन उपविद्या में किया गया है । पशचात्य विचारकों ने काव्य को कला के अंतर्गत मानकर विचार किया है । “पोएटिक्स में अरस्तु लिखते हैं, “”चित्रकार तथा उसी तरह के अन्य किसी भी कलाकार के समान कवि भी अनुकर्ता होता है, किन्तु काव्य-कला का औचित्य राजनीति-कला अथवा अन्य किसी कला के औचित्य से भिन्न प्रकार का  होता है । यहां यह भी स्पष्ट है कि अरस्तु की कला संबंधी मान्यता इतनी व्यापक है कि वहां राजनीतिशास्त्र पर भी कला के अंतर्गत ही विचार होता है । तथापि काव्य और कला दोनों में तर्क और कल्पना के पारस्परिक विरोध और द्वन्द्व से एक सामंजस्य की रचना होती है ।  जनवादी चेतना के लब्ध-प्रतिष्ठ कवि विजेन्द्र की कविताओं और चित्रों का अनूठा संग्रह ‘ आधी रात के रंग ‘  कवि के बहुआयामी व्यक्तित्व को तो उद्घाटित करता ही है, यह कलात्मक अभिरुचि और अभिव्यक्ति की अंतरअनुशासनिक आवा-जाही का विरल उदाहरण रचता है ।

 विजेन्द्र की कविताएं एक चित्रकार की कविताएं हैं या विजेन्द्र के चित्र एक कवि के रचे चित्र हैं, इस पर सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं। पर यह तय है कि दोनों रचनात्मक कर्म एक दूसरे को समृद्ध करते प्रतीत होते हैं : 
  ” जो कुछ कविता में छूटता है
   मैंने चाहा कि उसे
   रंग, बुनावट, रेखाओं और दृश्यबिंबों में
   रच सकूं । ”  
                                                     (कवि)

 इस संकलन के बारे में स्वयं कवि ने स्वीकार किया है कि उन्होंने चित्र पहले बनाये और बाद में उन पर कविताएं रचीं । यही नहीं हिन्दी न जानने वाले काव्य-रसिकों के लिए उन कविताओं का सुघड़ अंग्रेजी रूपांतर भी किया ।
 लंबे कवि कर्म के दौरान कविताओं के साथ-साथ चित्र भी हमेशा विजेन्द्र के कवि रूप के पूरक के रूप में उनके साथ रहे हैं । इस संबंध में वरिष्ठ समालोचक डॉ० जीवन सिंह की सारगर्भित  टिप्पणी विजेन्द्र के कवि और कलाकार व्यक्तितत्व — उनके शिल्पी मन — को समझने में एक कुंजी की तरह है ।  डॉ० जीवन सिंह के अनुसार अर्थगर्भित चित्रात्मकता विजेन्द्र की कविता में सर्वत्र लक्षित की जा सकती है । चित्रों को देखकर यह धारणा पक्की होती है कि विजेन्द्र की कविता में सघन चित्रोपमता उनके काव्य मन में छिपे एक चित्रकार के कारण ही सजीव हुई है । कविता में विजेन्द्र हर बार लोक के निकट जाते हैं । यह रुझान चित्रों के रंग-संयोजन, विषय-चयन तथा खुरदरी बुनावट में भी मुखर है।                                                                  

                                                                                                 जारी……..

                         

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 ”एक मुक्त संवाद –
  आत्मीय क्षणों में कविता ही है
  जहां मैं –
  तुमसे कुछ छिपाऊं नहीं
  सुंदर चीजों को अमरता प्राप्त हो
  यही मेरी कामना है

  जबकि मनुष्य उच्च लक्ष्य के लिए
  प्रेरित रहें !
  हर बार मुझे तो खोना-ही-खोना है
  क्योंकि कविता को जीवित रखना
  कोई आसान काम नहीं
  सिवाय जीवन तप के ।
  x x x x x x x x x x x
  गाओ, गाओ……..ओ कवि ऐसा
  जिससे टूटे और निराश लोग
  जीवन को जीने योग्य समझें ।
  हृदय से उमड़े शब्द
  आत्मा का उजास कहते हैं ।
                                          (कवि)

 ’रंगो की स्वायत्तता’ कविता में कवि रंगों के संसार में प्रवेश करता है और वहां से अनुशासनिक हदबंदी को तोड़ते हुए संगीत के सुरीले इलाके में :

  रंगों की स्वायत्तता में भी
  कविता है –
  x x x x x x x x x x 
  रंग उन रूपकों की तरह हैं
  जो करते हैं कैन्वास को स्पंदित
  x x x x x x x x x x x x
  ……………….ओ रंगों
  दृश्य क्षितिज रचकर
  मुझे कविता की ऐसी संगति दो
  जहां मैं अपनी आत्मा का
  आरोह-अवरोह सुन सकूं ।

 ’गायक’ कविता में गायक को उसके दायित्व का बोध कराते हुए कवि कहता है :
  तुम वे गीत भी गाओ
  जो मनुष्य की यंत्रणाएं बताते हैं ।

‘मिथक का सच’ कविता में कवि स्वयं से भी यही अपेक्षा रखता है :


  ओ मेरे निजी गान
  तू दूसरों का भी बन
 एक सच्चा प्रगतिशील कवि परंपरा को किस तरह निरखता और परखता है, ‘आद्याशक्ति दुर्गा’ कविता इसका उत्कृष्ट उदाहरण है । ‘प्रकृति और मैं’  कविता पर्यावरण प्रदूषण पर एक जागरूक कवि की तीखी टिप्पणी है । ‘नागफणी’ में कवि परिवेश से कटे तथाकथित आधुनिकतावादियों के सौंदर्यबोध के छद्म को उघाड़कर सामने रखता है ।

 ’आधी रात के रंग’  काव्य-चत्र संग्रह एक ऐसे प्रगतिशील कवि की कविताओं और चत्रों का अनुपम संकलन है जो ‘अपनी जड़ों का बहुत ऋणी’ है और जिसकी कविताओं में देशज परंपराओं का भरपूर पोषक रस है । परस्पर आंतरिक संगति से युक्त इन चित्रों और कविताओं का अंतर्छंद एक है । अमूर्तन के बावजूद विजेन्द्र के चत्रों का सूक्ष्म अर्थ स्वयं प्रकाशित है । ‘आधी रात के रंग’ संकलन में दृढ़ इच्छा शक्ति और संश्लिष्ट जीवनबोध वाले दृष्टिवान कवि की ‘जीवन के तप और ताप की कविताएं’ तो हैं ही, उन कविताओं का बेहतरीन अंग्रेजी अनुवाद तथा सघन ऐन्द्रिकता से भरे-पूरे उनके बहुरंगी चित्र भी संग्रहीत हैं । यह संकलन इस विपन्न समय में समृद्धि का बोध करानेवाली आंतरिक रचनात्मक जुगलबंदी की अनुपम और विरल प्रस्तुति है ।

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( कृतिओर प्रकाशन, सी-133, वैशाली नगर, जयपुर - 302021 , मूल्य : 495 रु.)

 

Kedarnath Singh, Vijendra, Gyanendrapti, Rajesh Joshi & others

फोटो : साभार

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