अनहद नाद

December 15, 2006

राजकिशोर की एक गज़ल

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:38 am

 

सीता है या गीता है

जीवन भर की मीता है

 

उसका दर्ज़ा सर्वोपरि

आखिर वह परिणीता है

 

मीठा से मीठा रिश्ता

उसके आगे तीता है

 

तृष्णा उसे सताए क्यों

जो इस रस को पीता है

 

कइयों का कहना है यह

हिरन भेस में चीता है

 

कहता हूं मैं प्यारे तू

अगर खरा हो जीता है

 

आगे बेहतर बीतेगा

जैसा अब तक बीता है।

 

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