अनहद नाद

January 25, 2007

जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:26 am

लुंगी

 

घूमना हो तो लपेट लीजिए

और दोपहरी नींद आ जाए

किसी तरु तले तो तान लीजिए देह पर

 

लुंगी वसन भी है

ओढ़ना भी

 

आप जैसे चाहिए

काम आ जाती है लुंगी

उसे कोई शिकायत नहीं होती अपने इस्तेमाल पर

लेकिन वह टूटने लगती है तब

जब उसे जोड़ा जाता है

पिछड़ेपन और धार्मिक पहनावे से

 

उसके आंसू किसानों के पसीने के साथ

सींचने लगते हैं खेत

 

जाने कब से किसानों-मजूरों का

कभी भगई   कभी तहमद

कभी लुंगी के नाम से लाज रखती वह

किसी धर्म  किसी राष्ट्र की कैद में नहीं

किसानों-मजूरों के जीवन में ही

सुख का झंडा बनकर लहराना चाहती है ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

January 18, 2007

गिरधर राठी की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:18 am

दिल्लीनामा

 

देखे चांद-सितारे देखे

तनहा-तनहा सारे देखे

 

साहिल और सहारे देखे

हसरत के गुब्बारे देखे

 

बुत मस्जिद गुरुद्वारे देखे

गुरबत के अंगारे देखे

 

तड़-तड़ टूटे ईमां देखे

रोज़ नए बंटवारे देखे

 

दौलत की दीवारें देखीं

ताकत के गलियारे देखे

 

शौक-ओ-अदब के चौबारों पर

रहजन रहबर सारे देखे

 

चौरासी का मरघट देखा

इकहत्तर सैयारे देखे

 

साहिब और मुसाहिब देखे

रह देखी रखवारे देखे

 

उसकी आंखों से जो देखा

राह पडे़ बेचारे देखे

 

अपनी तरफ़ उठी जो नज़रें

धुआं-धुआं नज़्ज़ारे देखे ।

 

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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

January 9, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:56 am

 

जिस समय में

 

जिस समय में

सब कुछ

इतनी तेजी से बदल रहा है

 

वही समय

मेरी प्रतीक्षा में

न जाने कब से

ठहरा हुआ है !

 

उसकी इस विनम्रता से

काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव

कुछ अधिक

गहरा हुआ है ।

 

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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

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