Posted by: PRIYANKAR | January 9, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

 kuMvara naaraayaNa

जिस समय में

 

जिस समय में

सब कुछ

इतनी तेजी से बदल रहा है

 

वही समय

मेरी प्रतीक्षा में

न जाने कब से

ठहरा हुआ है !

 

उसकी इस विनम्रता से

काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव

कुछ अधिक

गहरा हुआ है ।

 

******

(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

 


Responses

  1. धन्यवाद प्रिंयकर जी.

  2. कितनी आसानी से कही गयी है – मेनेजर को छू लेने वाली बडी सी बात.

  3. मेरे हिन्दी टाइप राइटर का किया अनर्थ देखिये “मन” को “मेनेजर” बना दिया. :( ऑटो करेक्शन बंद करना पड़ेगा.

  4. बहुत ही अच्छी रचना ।

  5. bahut khub

  6. बहुत सुंदर. सहज और सरल मगर कितनी गहरी अभिव्यति.

  7. waqt thahar gyaa yani sabkuch thahar gaya,mukt ahsaaso me jivan rukgyi hai waqt to ek khyaal tha.

  8. बहुत अच्छा लगा ये कविता पढ़कर। आभार!

  9. एक उत्कृष्ट रचना है, हृदय को छू गई!


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