
जिस समय में
जिस समय में
सब कुछ
इतनी तेजी से बदल रहा है
वही समय
मेरी प्रतीक्षा में
न जाने कब से
ठहरा हुआ है !
उसकी इस विनम्रता से
काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव
कुछ अधिक
गहरा हुआ है ।
******
(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

जिस समय में
जिस समय में
सब कुछ
इतनी तेजी से बदल रहा है
वही समय
मेरी प्रतीक्षा में
न जाने कब से
ठहरा हुआ है !
उसकी इस विनम्रता से
काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव
कुछ अधिक
गहरा हुआ है ।
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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)
Posted in कविताएं/Poems | Tags: कुंवर नारायण
धन्यवाद प्रिंयकर जी.
By: गिरिराज जोशी on January 9, 2007
at 9:43 am
कितनी आसानी से कही गयी है – मेनेजर को छू लेने वाली बडी सी बात.
By: अनुराग on January 9, 2007
at 10:08 am
मेरे हिन्दी टाइप राइटर का किया अनर्थ देखिये “मन” को “मेनेजर” बना दिया.
ऑटो करेक्शन बंद करना पड़ेगा.
By: अनुराग on January 9, 2007
at 10:10 am
बहुत ही अच्छी रचना ।
By: Prabhakar Pandey on January 9, 2007
at 11:12 am
bahut khub
By: संजय बेंगाणी on January 9, 2007
at 2:19 pm
बहुत सुंदर. सहज और सरल मगर कितनी गहरी अभिव्यति.
By: समीर लाल on January 9, 2007
at 2:32 pm
waqt thahar gyaa yani sabkuch thahar gaya,mukt ahsaaso me jivan rukgyi hai waqt to ek khyaal tha.
By: Divyabh on January 9, 2007
at 7:15 pm
बहुत अच्छा लगा ये कविता पढ़कर। आभार!
By: अनूप शुक्ला on January 10, 2007
at 4:24 am
एक उत्कृष्ट रचना है, हृदय को छू गई!
By: महावीर on January 10, 2007
at 11:19 pm