अनहद नाद

January 9, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:56 am

 kuMvara naaraayaNa

जिस समय में

 

जिस समय में

सब कुछ

इतनी तेजी से बदल रहा है

 

वही समय

मेरी प्रतीक्षा में

न जाने कब से

ठहरा हुआ है !

 

उसकी इस विनम्रता से

काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव

कुछ अधिक

गहरा हुआ है ।

 

******

(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

 

9 Comments »

  1. धन्यवाद प्रिंयकर जी.

    Comment by गिरिराज जोशी — January 9, 2007 @ 9:43 am

  2. कितनी आसानी से कही गयी है - मेनेजर को छू लेने वाली बडी सी बात.

    Comment by अनुराग — January 9, 2007 @ 10:08 am

  3. मेरे हिन्दी टाइप राइटर का किया अनर्थ देखिये “मन” को “मेनेजर” बना दिया. :( ऑटो करेक्शन बंद करना पड़ेगा.

    Comment by अनुराग — January 9, 2007 @ 10:10 am

  4. बहुत ही अच्छी रचना ।

    Comment by Prabhakar Pandey — January 9, 2007 @ 11:12 am

  5. bahut khub

    Comment by संजय बेंगाणी — January 9, 2007 @ 2:19 pm

  6. बहुत सुंदर. सहज और सरल मगर कितनी गहरी अभिव्यति.

    Comment by समीर लाल — January 9, 2007 @ 2:32 pm

  7. waqt thahar gyaa yani sabkuch thahar gaya,mukt ahsaaso me jivan rukgyi hai waqt to ek khyaal tha.

    Comment by Divyabh — January 9, 2007 @ 7:15 pm

  8. बहुत अच्छा लगा ये कविता पढ़कर। आभार!

    Comment by अनूप शुक्ला — January 10, 2007 @ 4:24 am

  9. एक उत्कृष्ट रचना है, हृदय को छू गई!

    Comment by महावीर — January 10, 2007 @ 11:19 pm

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