दिल्लीनामा
देखे चांद-सितारे देखे
तनहा-तनहा सारे देखे
साहिल और सहारे देखे
हसरत के गुब्बारे देखे
बुत मस्जिद गुरुद्वारे देखे
गुरबत के अंगारे देखे
तड़-तड़ टूटे ईमां देखे
रोज़ नए बंटवारे देखे
दौलत की दीवारें देखीं
ताकत के गलियारे देखे
शौक-ओ-अदब के चौबारों पर
रहजन रहबर सारे देखे
चौरासी का मरघट देखा
इकहत्तर सैयारे देखे
साहिब और मुसाहिब देखे
रह देखी रखवारे देखे
उसकी आंखों से जो देखा
राह पडे़ बेचारे देखे
अपनी तरफ़ उठी जो नज़रें
धुआं-धुआं नज़्ज़ारे देखे ।
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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)
बहुत ख़ूब! वाह…
By: अनुराग on January 18, 2007
at 10:46 am
कविता अच्छी लगी! आप अपनी कवितायें भी पोस्ट करें प्रियंकरजी!
By: अनूप शुक्ला on January 18, 2007
at 12:02 pm
एक अच्छी कविता पेश करने के लिए धन्यवाद !
By: मनीष on January 18, 2007
at 1:27 pm
बहुत अच्छी कविता !!!
By: प्रेमलता on January 18, 2007
at 3:43 pm
राठीजी की कविता प्रस्तुत करने के लिए आभार ।
By: अफ़लातून on January 18, 2007
at 4:19 pm
बहुत बढ़ियां कविता, बधाई राठी जी को और आपका साधुवाद.
By: समीर लाल on January 18, 2007
at 5:02 pm
बहुत सुन्दर । इसे हमारे साथ बाँटनें के लिये धन्यवाद ।
By: anoop bhargava on January 21, 2007
at 6:46 am