जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता
लुंगी
घूमना हो तो लपेट लीजिए
और दोपहरी नींद आ जाए
किसी तरु तले तो तान लीजिए देह पर
लुंगी वसन भी है
ओढ़ना भी
आप जैसे चाहिए
काम आ जाती है लुंगी
उसे कोई शिकायत नहीं होती अपने इस्तेमाल पर
लेकिन वह टूटने लगती है तब
जब उसे जोड़ा जाता है
पिछड़ेपन और धार्मिक पहनावे से
उसके आंसू किसानों के पसीने के साथ
सींचने लगते हैं खेत
जाने कब से किसानों-मजूरों का
कभी भगई कभी तहमद
कभी लुंगी के नाम से लाज रखती वह
किसी धर्म किसी राष्ट्र की कैद में नहीं
किसानों-मजूरों के जीवन में ही
सुख का झंडा बनकर लहराना चाहती है ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
Vaah lungi par kavita..kamaal hai……
Comment by Ravindra Bhartiya — January 25, 2007 @ 4:08 pm
आह कुंगी ! वाह लुंगी !दक्षिण से भी जोड़ती है सिर्फ़ लुंगी ?
Comment by अफ़लातून — January 25, 2007 @ 5:42 pm
बहुत ही अच्छी रचना ।
Comment by Prabhakar Pandey — January 25, 2007 @ 5:42 pm
बढ़िया कविता है, बधाई.
Comment by समीर लाल — January 25, 2007 @ 8:21 pm
बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हुई।
Comment by Dr Prabhat Tandon — January 26, 2007 @ 5:07 am
अच्छी कविता
Comment by PRAMENDRA PRATAP SINGH — February 12, 2007 @ 2:38 pm