विजेन्द्र की एक कविता
अच्छत धरती
अच्छत धरती तोड़ रहा हूं
ठाड़ी खरपतवार घनेरी
उसी-उसी को
गोड़ रहा हूं
सुनो,सुनो –
क्यों तुम चौंको
भेड़ धसानी
मोड़ रहा हूं
जिसका होता बड़ा कलेजा
वो ही मिनख
लौह गलाता
जो चलता गढ़ लीकों भारी
वो ही तम को
मार भगाता
सुनते-सुनते कान पक गए
कहते-कहते जीभ पिरानी
ढहा ढहा पत्थर का गढ़ फिर
टूटे धागे जोड़ रहा हूं
देखो, कविगण
हांफ रहे हैं
आमंत्रित हैं राजभवन में
चूना-खैनी फांक रहे हैं
देख रजत मुद्रा ललचाएं
भजनानंदी ओढ़ दुपट्टा
मधुर कंठ से
गाना गाएं
कैसा ढब है
कैसा करतब
होड़ मची लेने को अर्दब
ऊपर जिनको हंसते पाया
अंदर उनको रोते पाया
कैसा बखत है भाया मेरे
बिना नीर के
नदियां सूखें
बिना चले ही
रानें दूखें
अपनी राह चला चलता हूं
टिर्री क्यों गलियारे भूंकें
देख मुझे वे गुर्राते हैं
अंदर-अंदर थर्राते हैं
मैंने जिनको छाया दी है
पके फलों की
आभा दी है
वे ही मुझको काट रहे हैं
मुझको
मुझसे बांट रहे हैं
पट्टे उनके चमक रहे हैं
मालिक उनके दमक रहे हैं।
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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)
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पहले तुम्हारा खिलना (काव्य संग्रह)
विजेन्द्र

भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली से प्रकाशित
प्रियंकर जी, मेरे आलेख में श्री मशालकर के बारे में लिखा गया भाग १२ फरवरी के टाईमस् आफ इंडिया (Times of India) अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपे एक लेख पर आधारित है जिसके लेखक हैं छन पार्क (Chan Park)और अचल प्रभाला (Achel Prabhala).
Comment by सुनील — February 21, 2007 @ 4:18 pm
धन्यवाद प्रियँकर जी, ये कविता बहुत पसँद आई.
Comment by rachana — February 21, 2007 @ 4:55 pm
वाह ! बहुत भायी कविता
Comment by प्रत्यक्षा — February 22, 2007 @ 4:23 am
बहुत बढिया कविता है , बहुत सशक्त …
विजेन्द्र जी के बारे में कुछ और बतायें ।
Comment by rajni bhargava — February 22, 2007 @ 6:42 am
अरे ! ये ऊपर वाली टिप्पणी मेरी है …
रजनी logged on थी और टिप्पणी मैनें अपने दे दी ..
Comment by अनूप भार्गव — February 22, 2007 @ 6:44 am
badhayee
Comment by Zakir Ali 'Rajneesh' — June 12, 2007 @ 5:44 am