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	<title>Comments on: बेजी! आपके सवालों के जवाब हाज़िर हैं</title>
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	<description>प्रियंकर का काव्य और काव्य-चर्चा पर केन्द्रित चिट्ठा</description>
	<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 19:51:26 +0000</pubDate>
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		<title>By: प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-1139</link>
		<dc:creator>प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Nov 2007 11:30:39 +0000</pubDate>
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		<description>आज आपके ब्‍लाग पर मुझे अपना नाम देख कर काफी खुशी हो रही है, जब आपको भी अपनी 8 माह पुरानी रचना पर टिप्‍पणी मिलेगी तो निश्चित रूप से आपको भी अच्‍छा लगेगा। 

आपने मुझ पर विश्‍वास दिखाया है,मै पूरी तरह कसौटी पर खरा उतरने की कोशिस करूँगा। 

आपका 
प्रमेन्‍द्र</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज आपके ब्‍लाग पर मुझे अपना नाम देख कर काफी खुशी हो रही है, जब आपको भी अपनी 8 माह पुरानी रचना पर टिप्‍पणी मिलेगी तो निश्चित रूप से आपको भी अच्‍छा लगेगा। </p>
<p>आपने मुझ पर विश्‍वास दिखाया है,मै पूरी तरह कसौटी पर खरा उतरने की कोशिस करूँगा। </p>
<p>आपका<br />
प्रमेन्‍द्र</p>
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		<title>By: फुरसतिया &#187; तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-178</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 18:18:41 +0000</pubDate>
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		<description>[...] हो जायेगा। उनकी पहली प्रेम पाती बकरी चबा गयी। क्या हाल हुआ होगा हम कल्पना कर [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] हो जायेगा। उनकी पहली प्रेम पाती बकरी चबा गयी। क्या हाल हुआ होगा हम कल्पना कर [...]</p>
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	</item>
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		<title>By: प्रत्यक्षा</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-176</link>
		<dc:creator>प्रत्यक्षा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 04:50:20 +0000</pubDate>
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		<description>सबसे पहले आपके परिचय से आपको जाना था । लगा था कुछ अलग है । आज विस्तार से आपको  जानना और भी अच्छा लगा ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सबसे पहले आपके परिचय से आपको जाना था । लगा था कुछ अलग है । आज विस्तार से आपको  जानना और भी अच्छा लगा ।</p>
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		<title>By: Rachana</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-170</link>
		<dc:creator>Rachana</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 17:31:46 +0000</pubDate>
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		<description>प्रियँकर जी, आपके चिट्ठे पर कविताएँ पढना मुझे बहुत पसँद है.जिस दिन पहली बार आपकी टिप्पणी मैने अपने चिट्ठे पर देखी तब बेहद खुशी हुई थी! आपके बारे मे जानकारी भी आपने रुचिकर ढँग से दी है. आपने और तमाम वरिष्ठ लोगों जिस आत्मीयता से प्रश्नों के उत्तर दिये हैं, लग रहा है कि प्रश्न पूछना सार्थक हो गया.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रियँकर जी, आपके चिट्ठे पर कविताएँ पढना मुझे बहुत पसँद है.जिस दिन पहली बार आपकी टिप्पणी मैने अपने चिट्ठे पर देखी तब बेहद खुशी हुई थी! आपके बारे मे जानकारी भी आपने रुचिकर ढँग से दी है. आपने और तमाम वरिष्ठ लोगों जिस आत्मीयता से प्रश्नों के उत्तर दिये हैं, लग रहा है कि प्रश्न पूछना सार्थक हो गया.</p>
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		<title>By: neelima</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-169</link>
		<dc:creator>neelima</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Feb 2007 06:07:59 +0000</pubDate>
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		<description>आप चिट्ठाकारी की इस निर्माणाधीन इमारत में वाकई अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। कुछ कुछ उन तख्‍तों जैसी जो सीमेंट कंक्रीट की छतें डालने के लिए पहले सॉंचा बनाने लगाने के लिए खड़े किए जाते हैं और बाद में खुद हट जाते हैं, केवल इमारत खड़ी रह जाती है। जारी रहें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप चिट्ठाकारी की इस निर्माणाधीन इमारत में वाकई अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। कुछ कुछ उन तख्‍तों जैसी जो सीमेंट कंक्रीट की छतें डालने के लिए पहले सॉंचा बनाने लगाने के लिए खड़े किए जाते हैं और बाद में खुद हट जाते हैं, केवल इमारत खड़ी रह जाती है। जारी रहें।</p>
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		<title>By: beji</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-166</link>
		<dc:creator>beji</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Feb 2007 06:16:07 +0000</pubDate>
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		<description>आपके जवाब पढ़कर अच्छा लगा । मैं अनूप जी से सहमत हूँ ।
वैसे आपको अन्तर्जाल पर अक्सर लाल सयाही लेकर चलते देखा है । जहाँ गलती वहाँ गोला :) । साहित्य में सही समीक्षा करने वालों का दायित्व बहुत महत्वपूर्ण है । आप इसे बखूबी निभा रहे हैं ।
वैसे आपने बताया नहीं उस बकरी को कोई अच्छा बकरा मिला या नहीँ !!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके जवाब पढ़कर अच्छा लगा । मैं अनूप जी से सहमत हूँ ।<br />
वैसे आपको अन्तर्जाल पर अक्सर लाल सयाही लेकर चलते देखा है । जहाँ गलती वहाँ गोला <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> । साहित्य में सही समीक्षा करने वालों का दायित्व बहुत महत्वपूर्ण है । आप इसे बखूबी निभा रहे हैं ।<br />
वैसे आपने बताया नहीं उस बकरी को कोई अच्छा बकरा मिला या नहीँ !!</p>
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		<title>By: अनजान</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-165</link>
		<dc:creator>अनजान</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Feb 2007 04:43:48 +0000</pubDate>
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		<description>अपने अन्दर के जज्बातों को जिस खुबसुरती से आपने कागज के पन्ने पर (ब्लाग पर) उकेरा है वो वाकई में काबिल ए तारीफ है । 

मजा आ गया !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने अन्दर के जज्बातों को जिस खुबसुरती से आपने कागज के पन्ने पर (ब्लाग पर) उकेरा है वो वाकई में काबिल ए तारीफ है । </p>
<p>मजा आ गया !</p>
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		<title>By: कॆसर‌</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-162</link>
		<dc:creator>कॆसर‌</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Feb 2007 04:52:18 +0000</pubDate>
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		<description>आप कॆ साइट कॊ दॆखकर अच्छा&#124; आप हमॆ बतायॆ की यह केसॆ बनाया &#124; आप लॊग कोन सा फान्ट इस्तॆमाल करतॆ हॆ ‌

कॆस‌र‌</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप कॆ साइट कॊ दॆखकर अच्छा| आप हमॆ बतायॆ की यह केसॆ बनाया | आप लॊग कोन सा फान्ट इस्तॆमाल करतॆ हॆ ‌</p>
<p>कॆस‌र‌</p>
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		<title>By: kesar</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-161</link>
		<dc:creator>kesar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Feb 2007 04:43:09 +0000</pubDate>
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		<description>आप कॆ साइट कॊ दॆखकर अच्छा&#124; आप हमॆ बतायॆ की यह केसॆ बनाया &#124;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप कॆ साइट कॊ दॆखकर अच्छा| आप हमॆ बतायॆ की यह केसॆ बनाया |</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://anahadnaad.wordpress.com/2007/02/23/reply-to-bejee/#comment-160</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Feb 2007 01:41:10 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत खूब! अच्छा लगा यह सारे सवालों के जवाब पढ़कर! यह जानना सुखद भी है कि हमारी भाषा-शैली और प्रस्तुति के आप कायल हैं! वैसे इससे हमारा संकट भी बढ़ा है- और सजग होकर लिखना पड़ेगा। 

पिक्चरों के बारे में भी बहुत अच्छी तरह लिखा आपने। मुगलेआजम में वह दृश्य भी याद आता है जब पृथ्वीराज कपूर की निगाहों के आतंक से अनारकली अपने सलीम का कुर्ता लिये-दिये, फाड़ती हुयी नीचे आ गिरती है। अभिमान भी अच्छी लगी मुझे। 

आप लगभग सभी चिट्ठे पढ़ते हैं- कविता में आपकी रुचि है। क्या ऐसा हो सकता है कि आप सप्ताह/पन्द्रह दिन/महीने भर में एक बार पोस्ट की गयी कविताऒं पर चर्चा कर सकें। इससे हमारे साथी चिट्ठाकारों को कुछ दिशा-दशा मिल सकती है जो नया लिखना शुरू कर रहे हैं। आपकी - &lt;b&gt;सूरज एक दिन भेज देगा अपनी रोशनी का बिल&lt;/b&gt; भाव वाली कविता मुझे बहुत पसंद है।

यह संयोग रहा कि हिंदी चिट्ठाजगत में आपके साथ लोगों की कहासुनी कुछ हो ही जाती रही। क्या कारण रहे यह पोस्टमार्टम बेकार हैं। तमाम मोहब्बतें कहा-सुनी  से ही शुरु होती रहीं हैं। :) मुझे लगता है कि यह नेट भी एक पर्दे की तरह है। और पर्दे के पीछे क्या है इसके बारे में अक्सर कयास लगाकर हम लोग बात-व्यवहार कर जाते हैं। और एक बात यह भी कि यहां कोई ट्रैफिक नियंत्रण संस्था संभव नहीं है। अधिक से अधिक हम लोग अपने उदाहरणों से दूसरे को प्रेरित कर सकते हैं बस्स। काहे से कर एक पीसी पर 'इसे पोस्ट करें' का बटन मौजूद है। 

इस प्रश्न  मंच के माध्यम से काफ़ी लोगों के बारे में जानने को मिला यह मजेदार है। इसके लिये शायद रचना बजाज बधाई की पात्रा हैं जिन्होंने पांच सीक्रेट बातें पूछने के बजाय पांच सवाल पूछने शुरू किये। बेजी जी का कविता मयी गद्य और आपका यह गद्य भी इस कड़ी की उपलब्धि है। मुझे तो यह लगता है कि आपको नियमित गद्य लेखन करना चाहिये। कुछ दिन पहले ज्ञानरंजनजी के लेखन के बारे में लिखने हुये दूधनाथ सिंह ने लिखात था- अपना मेस्ट्रो (ज्ञानरंजन) जो गद्य लिखता है वैसा कोई नहीं लिखता।मेस्ट्रो का गद्य २० वीं सदी की उपलब्धि है। मुझे लगता है लिखते-लिखते यहां भी कुछ 'मेस्ट्रो' बनेंगे। क्या कहते हैं आप!

अब कलकत्ता आने पर मुलाकात करने की योजनायें बनने लगीं हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब! अच्छा लगा यह सारे सवालों के जवाब पढ़कर! यह जानना सुखद भी है कि हमारी भाषा-शैली और प्रस्तुति के आप कायल हैं! वैसे इससे हमारा संकट भी बढ़ा है- और सजग होकर लिखना पड़ेगा। </p>
<p>पिक्चरों के बारे में भी बहुत अच्छी तरह लिखा आपने। मुगलेआजम में वह दृश्य भी याद आता है जब पृथ्वीराज कपूर की निगाहों के आतंक से अनारकली अपने सलीम का कुर्ता लिये-दिये, फाड़ती हुयी नीचे आ गिरती है। अभिमान भी अच्छी लगी मुझे। </p>
<p>आप लगभग सभी चिट्ठे पढ़ते हैं- कविता में आपकी रुचि है। क्या ऐसा हो सकता है कि आप सप्ताह/पन्द्रह दिन/महीने भर में एक बार पोस्ट की गयी कविताऒं पर चर्चा कर सकें। इससे हमारे साथी चिट्ठाकारों को कुछ दिशा-दशा मिल सकती है जो नया लिखना शुरू कर रहे हैं। आपकी - <b>सूरज एक दिन भेज देगा अपनी रोशनी का बिल</b> भाव वाली कविता मुझे बहुत पसंद है।</p>
<p>यह संयोग रहा कि हिंदी चिट्ठाजगत में आपके साथ लोगों की कहासुनी कुछ हो ही जाती रही। क्या कारण रहे यह पोस्टमार्टम बेकार हैं। तमाम मोहब्बतें कहा-सुनी  से ही शुरु होती रहीं हैं। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> मुझे लगता है कि यह नेट भी एक पर्दे की तरह है। और पर्दे के पीछे क्या है इसके बारे में अक्सर कयास लगाकर हम लोग बात-व्यवहार कर जाते हैं। और एक बात यह भी कि यहां कोई ट्रैफिक नियंत्रण संस्था संभव नहीं है। अधिक से अधिक हम लोग अपने उदाहरणों से दूसरे को प्रेरित कर सकते हैं बस्स। काहे से कर एक पीसी पर &#8216;इसे पोस्ट करें&#8217; का बटन मौजूद है। </p>
<p>इस प्रश्न  मंच के माध्यम से काफ़ी लोगों के बारे में जानने को मिला यह मजेदार है। इसके लिये शायद रचना बजाज बधाई की पात्रा हैं जिन्होंने पांच सीक्रेट बातें पूछने के बजाय पांच सवाल पूछने शुरू किये। बेजी जी का कविता मयी गद्य और आपका यह गद्य भी इस कड़ी की उपलब्धि है। मुझे तो यह लगता है कि आपको नियमित गद्य लेखन करना चाहिये। कुछ दिन पहले ज्ञानरंजनजी के लेखन के बारे में लिखने हुये दूधनाथ सिंह ने लिखात था- अपना मेस्ट्रो (ज्ञानरंजन) जो गद्य लिखता है वैसा कोई नहीं लिखता।मेस्ट्रो का गद्य २० वीं सदी की उपलब्धि है। मुझे लगता है लिखते-लिखते यहां भी कुछ &#8216;मेस्ट्रो&#8217; बनेंगे। क्या कहते हैं आप!</p>
<p>अब कलकत्ता आने पर मुलाकात करने की योजनायें बनने लगीं हैं!</p>
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