अनहद नाद

March 29, 2007

त्वचा ही इन दिनों दिखती है चारों ओर : मंगलेश डबराल की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:37 am

 मंगलेश डबराल

त्वचा

 

त्वचा ही इन दिनों दिखती है चारों ओर

त्वचामय बदन त्वचामय सामान

त्वचा का बना कुल जहान

टीवी रात-दिन दिखलाता है जिसके चलते-फिरते दृश्य

त्वचा पर न्योछावर सब कुछ

कई तरह के लेप उबटन झाग तौलिए आसमान से गिरते हुए

कमनीय त्वचा का आदान-प्रदान करते दिखते हैं स्त्री-पुरुष

प्रेम की एक परत का नाम है प्रेम

अध्यात्म की खाल जैसा अध्यात्म

सतह ही सतह फैली है हर जगह उस पर नए-नए चमत्कार

एक सुंदर सतह के नीचे आसानी से छुप जाता है एक कुरूप विचार

एक दिव्य त्वचा पहनकर प्रकट होता है मुकुटधारी भगवान

 

यह कोई और ही त्वचा है

जो जीती-जागती-धड़कती देह में से नहीं उपजती उसकी सुंदरता बनकर

जो सांस नहीं लेती जिसके रोंये नहीं सिहरते

जिसे पीड़ा नहीं महसूस होती

यह कबीर की मुई खाल नहीं है

जिसकी गहरी सांस लोहे को भस्म कर देती है

यह कोई और ही त्वचा है जो कोई पुकार नहीं सुनती

जिसे छूने पर रक्त नहीं उछलता हृदय नहीं पसीजता

सतह पर पड़ा रहता है दुख

झुर्रियों के समुद्र में विलीन होती जाती मोटी खाल की एक नदी

अपने साथ बहाकर ले जाती है सुगंधमय प्रसाधन तौलिए उबटन

यही है हमारा त्वचामय समय यही है हमारा निवास

इसी पर नाचते हैं हमारे विचार

देखो एक रोगशोकजरामरणविहीन कविता की दशा

वह यहां त्वचा की तरह सूखती हुई पड़ी है ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग से साभार

 

March 23, 2007

निराशा एक बेलगाम घोड़ी है : राजेश जोशी की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:03 am

निराशा

 

निराशा एक बेलगाम घोड़ी है

 

न हाथ में लगाम होगी न रकाब में पांव

खेल नहीं उस पर गद्दी गांठना

दुलत्ती झाड़ेगी और ज़मीन पर पटक देगी

बिगाड़ कर रख देगी सारा चेहरा-मोहरा

 

बगल में खड़ी होकर

ज़मीन पर अपने खुर बजाएगी

धूल के बगूले बनाएगी

जैसे कहती हो

दम है तो दुबारा गद्दी गांठो मुझ पर

 

भागना चाहोगे तो भागने नहीं देगी

घसीटते हुए ले जाएगी

और न जाने किन जंगलों में छोड़ आएगी !

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

March 20, 2007

इस पृष्ठ पर : प्रयाग शुक्ल की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:43 am

इस पृष्ठ पर

 

इस पृष्ठ पर कोई धमाका नहीं है

तेज-तेज ध्वनियों का

इस पृष्ठ पर कोई धमाका नहीं है

बम्पर लॉटरी का

 

इस पृष्ठ पर नहीं है

कोई धमाकेदार विज्ञापन

इस पृष्ठ पर धमाके के साथ

नहीं फूट रहे हैं बम

इस पृष्ठ पर कोई

धमाका नहीं करने जा रहे

हैं हम

 

इस पृष्ठ को हम रखने

जा रहे हैं सादा

देखें इसमें क्या

अंकित करते हैं आप !

 

********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

March 14, 2007

कुछ और : मनमोहन की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:19 am

कुछ और

 

भाइयो

बात थी कुछ और

जैसी कही गई

या समझी गई

वैसी न थी

या जैसी कि बन गई

 

जहां तक कुछ और की बात है

तो उसके बारे में कुछ और भी कहा जा सकता है

 

जैसे हम करते रहे कुछ-कुछ

बहुत कुछ करते रहे जबकि

हमें करना था कुछ और

 

और जैसे हम कहते रहे

हमें कुछ और वक्त चाहिए

जबकि सच तो ये है कि हमें चाहिए था

वक्त ही कुछ और ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

March 6, 2007

भगवत रावत की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 12:46 pm

 

मेधा पाटकर

 

करुणा और मनुष्यता की ज़मीन के

जिस टुकड़े पर तुम आज़ भी अपने पांव जमाए

खड़ी हुई हो अविचलित

वह तो कब का डूब में आ चुका है

मेधा पाटकर

 

रंगे सियारों की प्रचलित पुरानी कहानी में

कभी न कभी पकड़ा जरूर जाता था

रंगा सियार

पर अब बदली हुई पटकथा में

उसी की होती है जीत

उसी का होता है जय-जयकार

मेधा पाटकर

 

तुम अंततः जिसे बचाना चाहती हो

जीवन दे कर भी जिसे ज़िंदा रखना चाहती हो

तुम भी तो जानती हो कि वह न्याय

कब का दोमुंही भाषा की बलि चढ़ चुका है

मेधा पाटकर

 

हमने देखे हैं जश्न मनाते अपराधी चेहरे

देखा है नरसंहारी चेहरों को अपनी क्रूरता पर

गर्व से खिलखिलाते

पर हार के कगार पर

एक और लड़ाई लड़ने की उम्मीद में

बुद्ध की तरह शांत भाव से मुस्कुराते हुए

सिर्फ़ तुम्हें देखा है

मेधा पाटकर

 

तुम्हारे तप का मज़ाक उड़ाने वाले

आदमखोर चेहरों से अश्लीलता की बू आती है

तुम देखना उन्हें तो नर्मदा भी

कभी माफ़ नहीं करेगी

मेधा पाटकर

 

ऐसी भी जिद क्या

अपने बारे में भी सोचो

अधेड़ हो चुकी हो बहुत धूप सही

अब जाओ किसी वातानुकूलित कमरे की

किसी ऊंची-सी कुर्सी पर बैठ कर आराम करो

मेधा पाटकर

 

सारी दुनिया को वैश्विक गांव बनाने की फ़िराक में

बड़ी-बड़ी कंपनियां

तुम्हें शो-केस में सजाकर रखने के लिए

कबसे मुंह बाये बैठी हैं तुम्हारे इंतज़ार में

कुछ उनकी भी सुनो

मेधा पाटकर

 

खोखले साबित हुए हमारे सारे शब्द

झूठी निकलीं हमारी सारी प्रतिबद्धताएं

तमाशबीनों की तरह हम दूर खड़े-खड़े

गाते रहे दुनिया बदलने के

नकली गीत

तुम्हें छोड़कर

हम सबके सिर झुके हुए हैं

मेधा पाटकर ।

 

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( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

March 1, 2007

जगन्नाथ आज़ाद की नज़्म : भारत के मुसलमां (1949)

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:47 am

भारत के मुसलमां

 

 

इस दौर में तू क्यों है परेशां व हेरासां

भारत का तू फ़रज़ंद है बेगाना नहीं है

क्या बात है क्यों है मोत-ज़ल-ज़ल तेरा ईमां

ये देश तेरा घर है तू इस घर का मकीं है

दानिश कदए दहर की ऐ शम्मा फ़रोज़ां

ताबिन्दह तेरे नूर से इस घर की ज़बीं है

ऐ मतलऐ तहज़ीब के खुरशीदे दरख्शां

किस वास्ते अफ़सुरदह व दिलगीरो हज़ीं है

हैरत है घटाओं से तेरा नूर ही तरसां

पहले की तरह बागे वतन में हो नवाखां

 

भारत के मुसलमां      भारत के मुसलमां

 

तू दौरे मोहब्बत का तलबगार अज़लसे

मेरा ही नहीं है  ये गुलिस्तां है तेरा भी

तू मेहरो मोरव्वत का परसतार अज़लसे

हर रदो गुलो लालओ रेहां है तेरा भी

तू महरमे हर लज़्ज़ते असरार अज़लसे

इस खाक का हर ज़र्रए ताबां है तेरा भी

रअनाइये अफ़कार को कर फिर से गज़लखां

दामन में   उठा ले    ये सभी    गौहरे रखशां

 

भारत के मुसलमां       भारत के मुसलमां

 

हरगिज़ न भुला मीर का गालिब का तराना

कश्मीर के फूलों की रेदा तेरे लिये है

बन जाय कहीं तेरी हकीकत न फ़साना

दामाने हिमाला की हवा तेरे लिये है

कज़्ज़ाके फ़ना को तो है दरकार बहाना

मैसूर की जां बख्श फ़ज़ां तेरे लिये है

ताराज़ न हो कासिम व सय्यद का खज़ाना

मद्रास की हर मैजे सबा तेरे लिये है

ऐ कासिम व सय्यद के खज़ाने के निगेहबां

अब ख्वाब से बेदार हो सोये हुए इन्सां

 

भारत के मुसलमां         भारत के मुसलमां

 

हाफ़िज़ के तरन्नुम को बसा कल्ब व नज़र में

गुज़री हुई अज़मत का ज़माना है तेरा भी

रूमी के तफ़क्कुर को सज़ा कल्ब व नज़र में

तुलसी का दिलावेज़ तराना है तेरा भी

साअदी के तकल्लुम को बिठा कल्ब व नज़र में

जो कृष्ण ने छेड़ा था फ़साना है तेरा भी

दे नग्म ए खैय्याम को जा कल्ब व नज़र में

मेरा ही नहीं है ये खज़ाना है तेरा भी

ये लहन हो फिर हिंद की दुनिया में पुर अफ़शां

छोड़ अब मेरे प्यारे गिलएतन्गी ये दामां

 

भारत के मुसलमां         भारत के मुसलमां

 

सांची को ज़रा देख अज़न्ता को ज़रा देख

ज़ाहिर की मुहब्बत से मोरव्वत से गुज़र जा

मुमकिन हो तो नासिक को एलोरा को ज़रा देख

बातिन की अदावत से कदूरत से गुज़र जा

बिगड़ी हुई तस्वीरे तमाशा को ज़रा देख

बेकार व दिल अफ़गार कयादत से गुज़र जा

बिखरी हुई उस इल्म की दुनिया को ज़रा देख

इस दौर की बोसीदह सियासत से गुज़र जा

इस फ़न पे फ़कत मैं ही नहीं तू भी हो नाज़ां

और अज़्म से फिर थाम ज़रा दामने ईमां

 

भारत के मुसलमां    भारत के मुसलमां

 

तूफ़ान में तू ढूंढ रहा है जो किनारा

हम दोनों बहम मिल के हों भारत के मोहाफ़िज़

अमवाज का कर दीदये बातिन से नज़ारा

दोनों बनें इस मुल्क की अज़मत के मोहाफ़िज़

मुमकिन है कि हर मौजे नज़र को हो गवारा

देरीना मवद्दत के मोरव्वत के मोहाफ़िज़

मुमकिन है के हर मौज बने तेरा सहारा

इस देश की हर पाक रेवायत के मोहाफ़िज़

मुमकिन है कि साहिल हो पसे परदए तूफ़ां

हो नामे वतन ताकि बलन्दी पे दरख्शां

 

भारत के मुसलमां       भारत के मुसलमां

 

गुलज़ारे तमन्ना का निखरना भी यहीं है

इस्लाम की तालीम से बेगाना हुआ तू

दामन गुले मकसूद से भरना भी यहीं है

ना महरमे हर जुरअतेरिन्दानह हुआ तू

हर मुश्किल व आसां से गुज़रना भी यहीं है

आबादीये हर बज़्म था वीराना हुआ तू

जीना भी यहीं है जिसे मरना भी यहीं है

तू एक हकीकत था अब अफ़साना हुआ तू

क्यूं मन्जिले मकसूद से भटक जाये वो इंसां

मुमकिन हो तो फिर ढूंढ गंवाये हुए सामां

 

भारत के मुसलमां        भारत के मुसलमां

 

मानिन्दे सबा खेज़ व वज़ीदन दिगर आमोज़

अज़मेर की    दरगाहे  मोअल्ला     तेरी जागीर

अन्दर वलके गुन्चा खज़ीदन दीगर आमोज़

महबूब इलाही की    ज़मीं पर     तेरी तनवीर

दर अन्जुमने शौक तपीदन दिगर आमोज़

ज़र्रात में  कलियर के   फ़रोज़ां तेरी तस्वीर

नौमीद मशै नाला कशीदन दिगर आमोज़

हांसी की फ़ज़ाओं में   तेरे कैफ़ की तासीर

ऐ तू के लिए दिल में है फ़रियादे नयसतां

सरहिंद की मिट्टी   है   तेरे दम से फ़रोज़ां

 

भारत के मुसलमां          भारत के मुसलमां

 

 

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जगन्नाथ आज़ाद(1918-2004) : उर्दू के मशहूर शायर;ईसाखेल,पश्चिमी पंजाब में जन्म;पंजाब यूनिवर्सिटी,लाहौर से फ़ारसी में एम.ए.;मुहम्मद अली ज़िन्ना ने उनसे पाकिस्तान का राष्ट्रगीत लिखने का अनुरोध किया था;आज़ाद ने लिखा भी और वह जिन्ना की मृत्युपर्यंत लगभग डेढ़ वर्ष तक पाकिस्तान का राष्ट्रगीत रहा, तत्पश्चात हफ़ीज़ जलंधरी का लिखा नया राष्ट्रगीत मान्य हुआ; विभाजन के बाद लाहौर छोड़ने को बाध्य हुए;जगन्नाथ आज़ाद  अपने अंतिम समय में भारत और पाकिस्तान के लिए शांति का एक गीत लिखना चाहते थे.

 

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( यदि उर्दू नज़्म के देवनागरी लिप्यंतरण में कोई भूल हो तो कृपया ज़रूर बताएं ताकि सुधार किया जा सके )

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