अनहद नाद

April 30, 2007

एक बांग्ला कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:37 am

रंजीत कुमार राय की बांग्ला कविता

 ( बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )

 

 

जीवन आशा

 

नीले आकाश के अकाउण्ट में

अब और जमा नहीं हो रही है

स्वच्छ हवा ।

 

अकुलाहट से भरा मानव

खोज रहा है जीवन की समग्रता

लॉकर के गुमसुम अंधेरे में ।

 

इस कुहासे के छंटते ही

पुनः –

प्रकाश की पिपासा !

जीवन  की    आशा !

 

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April 23, 2007

सभ्यता का ज़हर

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 12:36 pm

विष्णुचंद्र शर्मा की एक कविता

 

 

 

सभ्यता का ज़हर

 

सुबह की

भाषा में

कोई प्रदूषण नहीं है

 

सुबह की

हवा

पेड़ों को

बजा रही है

 

सुबह की

भाषा में

ताज़े पेड़

पहाड़ों से

तराना

सीख रहे हैं

 

सुबह यहां

कोकाकोला की

भाषा में

ज़हर नहीं आया है

 

सभ्यता की मरी

हुई भाषा का फिर भी

ज़हर

फ़ैल रहा है

दिल में

दिमाग में ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

April 20, 2007

सोचो थोड़ी देर

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:57 am

विजय गौड़ की एक कविता

 

 

सोचो थोड़ी देर

 

आखिर कब तक

सरकारों का बदल जाना

मौसम के बदल जाने की तरह

नहीं   रहेगा   याद

 

कब तक यह कहते रहेंगे

इस बार गर्मी बड़ी तीखी है

बारिश भी हुई इस बार ज्यादा

और ठंड भी पड़ी पहले से अधिक ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

April 18, 2007

जब तक पेड़ है ……..

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:25 am

रविदत्त पालीवाल की एक कविता

 

 

 

नसीहत

 

जब तक पेड़ है

छांव तो रहेगी

पलेगी,   कहेगी –

धूप से

जितना तमतमाओगी

मुझमें निखार उतना

पाओगी

 

खिलो, पर तमतमाओ मत

डाकिया लाएगा तब

प्यार भरा खत ।

 

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April 16, 2007

मां सब कुछ कर सकती है ……..

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:45 am

विष्णु नागर की एक कविता

 

 

मां सब कुछ कर सकती है

 

मां सब कुछ कर सकती है

रात-रात भर बिना पलक झपकाए जाग सकती है

पूरा-पूरा दिन घर में खट सकती है

धरती से ज्यादा धैर्य रख सकती है

बर्फ़ से तेजी से पिघल सकती है

हिरणी से ज्यादा तेज दौड़कर खुद को भी चकित कर सकती है

आग में कूद सकती है

तैरती रह सकती है समुद्रों में

देश-परदेश   शहर-गांव    झुग्गी-झोंपड़ी   सड़क पर भी रह सकती है

 

वह शेरनी से ज्यादा खतरनाक

लोहे से ज्यादा कठोर सिद्ध हो सकती है

वह उत्तरी ध्रुव से ज्यादा ठंडी और

रोटी से ज्यादा मुलायम साबित हो सकती है

वह तेल से भी ज्यादा देर तक खौलती रह सकती है

चट्टान से भी ज्यादा मजबूत साबित हो सकती है

वह फांद सकती है ऊंची-से-ऊंची दीवारें

बिल्ली की तरह झपट्टा मार सकती है

वह फूस पर लेटकर महलों में रहने का सुख भोग सकती है

वह फुदक सकती है चिड़िया की मानिंद

जीवन बचाने के लिए वह कहीं से कुछ भी चुरा सकती है

किसी के भी पास जाकर वह गिड़गिड़ा सकती है

तलवार की धार पर दौड़ सकती है वह लहुलुहान हुए बिना

वह देर तक जल सकती है राख हुए बगैर

वह बुझ सकती है पानी के बिना

 

वह सब कुछ कर सकती है इसका यह मतलब नहीं

कि उससे सब कुछ करवा लेना चाहिए

उसे इस्तेमाल करनेवालों को गच्चा देना भी खूब आता है

और यह काम वह चेहरे से बिना कुछ कहे कर सकती है।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

April 13, 2007

अभिधान

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:10 am

वीरेन्द्र प्रसाद सिंह की एक कविता

 

 

 

 

अभिधान

 

संविधान

एक कबूतर

जिसे पर काट कर

उड़ा दिया जाता है

 

सूरज आज़ फिर

पूरब ही उग आया !

चांद की शेष हैं

आज़ भी चौंसठ कलाएं !

दिन और रात

फिर उसी रफ़्तार से है क्या ?

 

बस एक संशोधन और ।

 

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April 11, 2007

औरत

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:36 am

कैलाश सेंगर की तीन कविताएं

 

 

औरत

 

१.

बच्चे को सुलाती औरत

उसे सुनाती कहानी –

‘एक शहजादी को शहजादे से चुराकर

एक दैत्य ने पिंजड़े में बंद कर दिया’

कहानी सुन कर

बच्चा सो जाता है

कहानी की शहजादी

उसकी मां ही है

नहीं समझ पाता है।

 

२.

 

दोपहर को जब पति ऑफ़िस में

और बच्चे स्कूल में होते हैं

औरत टीवी पर आ रही

पुरानी ब्लैक एंड वाइट फ़िल्में देखती है

नई फ़िल्मों से

पुरानी फ़िल्में कितनी अच्छी होतीं हैं

कितना रोना आता है न उन्हें देखकर!

और तब खूब रोती है औरत

औरत सुकून से रोते हुए याद करती है

उन फ़िल्मों को

ताज़ा-ताज़ा,चुपके-चुपके देखने के वे प्रसंग

और खूब रो लेने के बाद,आंखें पोंछते हुए

हर रोज़ तय करती है वह

कि शाम पति और बच्चों के साथ

नई रंगीन फ़िल्मों के प्रोमोज़ देखेगी वह।

 

३.

 

औरत को

पुरानी आलमारी साफ़ करते हुए मिल जाती हैं

पुरानी तारीखों वाली     छुपाकर रखीं

कुछ गुलाबी चिट्ठियां     कुछ मुरझाए फूल

और चंद सूखी कसमें

पिछले माह ब्याह दी गई बेटी की

और उन्हें उसी तरह फिर से छुपाकर

लिखने लगती है बेटी को पत्र

पत्र में वह समझा देती है बेटी को

अच्छी तरह     संपूर्ण विधि

करवा चौथ की।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

April 9, 2007

इच्छा तो बहुत थी …….

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:01 am

 arun kamal

अरुण कमल की एक कविता

 

 

 

इच्छा थी

 

इच्छा तो बहुत थी कि एक घर होता

मेंहदी के अहाते वाला

कुछ बाड़ी-झाड़ी

कुछ फल-फूल

और द्वार पर एक गाय

और बाहर बरामदा में बैंत की कुर्सी

बारिश होती    तेल की कड़कड़    धुआं उठता

लोग-बाग आते –   बहन    कभी भाई     साथी संगी

कुछ फैलावा रहता      थोड़ी खुशफैली

 

पर लगा कुछ ज्यादा चाह लिया

स्वप्न भी यथार्थ के दास हैं भूल गया

खैर! जैसे भी हो जीवन कट जाएगा

न अपना घर होगा     न जमीन

फिर भी आसमान तो होगा कुछ-न-कुछ

फिर भी नदी होगी   कभी भरी कभी सूखी

रास्ते होंगे    शहर होगा      और एक पुकार

और यह भी कि कोई इच्छा थी कभी

तपती धरती पर तलवे का छाला ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

April 5, 2007

मत हँसो पाँचाली ……

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:33 am

प्रियंकर की एक कविता 

 

 

मत हँसो पांचाली

 

मत हँसो पांचाली
इतना भी मत हँसो
यह वो हँसी नहीं
जो सुख की शांति की उद्गम है
आस्था के सुवासित अक्षांशों से आती
मैत्री की मधुर सरगम है

” नायिका के हँसते ही
खिलते हैं चारों ओर फूल
बिखर जाते हैं सफेद मोती
चाँदनी में नहाते हैं
नदी के दोनों कूल 
फैलता है चतुर्दिक स्वर्णिम उजास
उमगती है अंतर में वासन्ती प्यास  ”

यह कल्पना-विलास की उक्ति
रूमानी गल्प-कथाओं में ही शोभती है
सत्य का सुमेरु तो यही है देवि
तीक्ष्ण हास्य ही बनाता है
सुयोधन को दुर्योधन
ऐसी दाहक हँसी
महासमर ही भोगती है ।

 

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April 4, 2007

मौन रहे !

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:00 am

प्रियंकर की एक कविता  

 

 

 मौन

 

कुछ समय
उन
स्मृतियों के
प्रवाह में
बहना चाहता हूं
और तुमसे
लय में कुछ
कहना चाहता हूं

पर सामने जब
निश्छलता की
साक्षात प्रतिमा हो
तो कोई क्या कहे
बेहतर है
मन से
मान दे
निश्छलता को
सादगी को
मौन रहे ।

 

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