अनहद नाद

April 4, 2007

मौन रहे !

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प्रियंकर की एक कविता  

 

 

 मौन

 

कुछ समय
उन
स्मृतियों के
प्रवाह में
बहना चाहता हूं
और तुमसे
लय में कुछ
कहना चाहता हूं

पर सामने जब
निश्छलता की
साक्षात प्रतिमा हो
तो कोई क्या कहे
बेहतर है
मन से
मान दे
निश्छलता को
सादगी को
मौन रहे ।

 

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