अनहद नाद

April 4, 2007

मौन रहे !

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:00 am

प्रियंकर की एक कविता  

 

 

 मौन

 

कुछ समय
उन
स्मृतियों के
प्रवाह में
बहना चाहता हूं
और तुमसे
लय में कुछ
कहना चाहता हूं

पर सामने जब
निश्छलता की
साक्षात प्रतिमा हो
तो कोई क्या कहे
बेहतर है
मन से
मान दे
निश्छलता को
सादगी को
मौन रहे ।

 

***********

13 Comments »

  1. चुप हूं.. समझ रहा हूं आप हमारी चुप्‍पी की सहोदरता समझेंगे।

    Comment by प्रमोद सिंह — April 4, 2007 @ 6:30 am

  2. मौन जब मौन में
    सब कहे
    तब मौन रहे…

    पर जब मूक हो
    तो कुछ कहो…
    ना चुप रहो…

    कविता अच्छी लगी…!!

    Comment by beji — April 4, 2007 @ 7:20 am

  3. वहाँ मान देने के लिये मौन उचित था.. यहाँ मान देने के लिये मौन अनुचित होगा..अज्ञेय की याद आई..

    Comment by अभय तिवारी — April 4, 2007 @ 7:20 am

  4. ..इस वाचाल हुए युग मे,
    चुप की भाषा को समझे कौन!!

    Comment by Rachana — April 4, 2007 @ 8:46 am

  5. बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

    Comment by ghughutibasuti — April 4, 2007 @ 9:47 am

  6. सादगी के साथ बहुत अच्छी बात कही आपने प्रियंकर जी।

    Comment by अजित वडनेरकर — April 4, 2007 @ 10:00 am

  7. बहुत सुन्दर ।

    Comment by अफ़लातून — April 4, 2007 @ 10:04 am

  8. मौन के पक्ष में बेहद किफायत से शब्द खर्चे आपने… अच्छा लगा।

    Comment by शशि सिंह — April 4, 2007 @ 10:23 am

  9. बहुत अच्छी कविता लगी.

    Comment by रजनी भार्गव — April 4, 2007 @ 11:58 am

  10. मन से
    मान दे
    निश्छलता को
    सादगी को
    मौन रहे ।

    –बहुत खूब, प्रियंकर भाई. ढ़ेरों मौन प्रशंसा और बधाईयाँ.

    Comment by समीर लाल — April 4, 2007 @ 12:37 pm

  11. वाह !!!!

    Comment by अनूप भार्गव — April 6, 2007 @ 12:16 am

  12. बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर!

    Comment by अनूप शुक्ला — April 14, 2007 @ 11:55 am

  13. Bhaut achha laga.

    Comment by ambalika nag — April 20, 2007 @ 9:08 am

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