अनहद नाद

April 9, 2007

इच्छा तो बहुत थी …….

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 arun kamal

अरुण कमल की एक कविता

 

 

 

इच्छा थी

 

इच्छा तो बहुत थी कि एक घर होता

मेंहदी के अहाते वाला

कुछ बाड़ी-झाड़ी

कुछ फल-फूल

और द्वार पर एक गाय

और बाहर बरामदा में बैंत की कुर्सी

बारिश होती    तेल की कड़कड़    धुआं उठता

लोग-बाग आते –   बहन    कभी भाई     साथी संगी

कुछ फैलावा रहता      थोड़ी खुशफैली

 

पर लगा कुछ ज्यादा चाह लिया

स्वप्न भी यथार्थ के दास हैं भूल गया

खैर! जैसे भी हो जीवन कट जाएगा

न अपना घर होगा     न जमीन

फिर भी आसमान तो होगा कुछ-न-कुछ

फिर भी नदी होगी   कभी भरी कभी सूखी

रास्ते होंगे    शहर होगा      और एक पुकार

और यह भी कि कोई इच्छा थी कभी

तपती धरती पर तलवे का छाला ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

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