इच्छा तो बहुत थी …….

अरुण कमल की एक कविता
इच्छा थी
इच्छा तो बहुत थी कि एक घर होता
मेंहदी के अहाते वाला
कुछ बाड़ी-झाड़ी
कुछ फल-फूल
और द्वार पर एक गाय
और बाहर बरामदा में बैंत की कुर्सी
बारिश होती तेल की कड़कड़ धुआं उठता
लोग-बाग आते – बहन कभी भाई साथी संगी
कुछ फैलावा रहता थोड़ी खुशफैली
पर लगा कुछ ज्यादा चाह लिया
स्वप्न भी यथार्थ के दास हैं भूल गया
खैर! जैसे भी हो जीवन कट जाएगा
न अपना घर होगा न जमीन
फिर भी आसमान तो होगा कुछ-न-कुछ
फिर भी नदी होगी कभी भरी कभी सूखी
रास्ते होंगे शहर होगा और एक पुकार
और यह भी कि कोई इच्छा थी कभी
तपती धरती पर तलवे का छाला ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
इस सुंदर कविता को प्रस्तुत करने के लिये बहुत बधाई.
Comment by समीर लाल — April 9, 2007 @ 12:24 pm
अच्छी कविता …धन्यवाद …
Comment by रीतेश गुप्ता — April 9, 2007 @ 12:47 pm
सच मे बढिया कविता है - हमारी समझ मे आने वाली कविता लिखने के लिए आपको बधाई
Comment by SHUAIB — April 9, 2007 @ 1:04 pm
धन्यवाद प्रियंकर भैया, बहुत सुन्दर कविता थी,
Comment by विशाल — April 9, 2007 @ 2:31 pm
सुन्दर ।
Comment by अफ़लातून — April 9, 2007 @ 3:09 pm
मासूम सी इच्छा!
Comment by Rachana — April 9, 2007 @ 5:06 pm
बहुत अच्छी लगी कविता।
Comment by अनूप शुक्ला — April 14, 2007 @ 11:56 am