अनहद नाद

April 13, 2007

अभिधान

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वीरेन्द्र प्रसाद सिंह की एक कविता

 

 

 

 

अभिधान

 

संविधान

एक कबूतर

जिसे पर काट कर

उड़ा दिया जाता है

 

सूरज आज़ फिर

पूरब ही उग आया !

चांद की शेष हैं

आज़ भी चौंसठ कलाएं !

दिन और रात

फिर उसी रफ़्तार से है क्या ?

 

बस एक संशोधन और ।

 

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