वीरेन्द्र प्रसाद सिंह की एक कविता
अभिधान
संविधान
एक कबूतर
जिसे पर काट कर
उड़ा दिया जाता है
सूरज आज़ फिर
पूरब ही उग आया !
चांद की शेष हैं
आज़ भी चौंसठ कलाएं !
दिन और रात
फिर उसी रफ़्तार से है क्या ?
बस एक संशोधन और ।
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