अनहद नाद

April 13, 2007

अभिधान

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:10 am

वीरेन्द्र प्रसाद सिंह की एक कविता

 

 

 

 

अभिधान

 

संविधान

एक कबूतर

जिसे पर काट कर

उड़ा दिया जाता है

 

सूरज आज़ फिर

पूरब ही उग आया !

चांद की शेष हैं

आज़ भी चौंसठ कलाएं !

दिन और रात

फिर उसी रफ़्तार से है क्या ?

 

बस एक संशोधन और ।

 

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1 Comment »

  1. ऐसा है क्या अपना संविधान!

    Comment by अनूप शुक्ला — April 14, 2007 @ 11:59 am

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