एक बांग्ला कविता
रंजीत कुमार राय की बांग्ला कविता
( बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )
जीवन आशा
नीले आकाश के अकाउण्ट में
अब और जमा नहीं हो रही है
स्वच्छ हवा ।
अकुलाहट से भरा मानव
खोज रहा है जीवन की समग्रता
लॉकर के गुमसुम अंधेरे में ।
इस कुहासे के छंटते ही
पुनः –
प्रकाश की पिपासा !
जीवन की आशा !
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कवि से कहिये प्रकाश की पिपासा, जीवन की आशा वो सब ठीक है मगर यह कुहासा जो है वो छंटनेवाला नहीं.. आपनार ओनुबाद किंतु भालो.. आर कोरुन.. छेंटे-छेंटे भालो गुलु बाइरे निये आशुन..
Comment by प्रमोद सिंह — April 30, 2007 @ 12:34 pm
अनुवादक और कवि दोनों को साधुवाद । कभी - कभी देवनागरी में बाँग्ला कविताएँ भी दी जा सकती हैं ? इसका यह मतलब नहीं कि काव्यानुवाद न हो ।
Comment by अफ़लातून — April 30, 2007 @ 4:03 pm
बढ़िया-अनुवाद में भी भाव उभर कर आ रहे हैं. बधाई!!
Comment by समीर लाल — April 30, 2007 @ 11:09 pm