अनहद नाद

April 30, 2007

एक बांग्ला कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:37 am

रंजीत कुमार राय की बांग्ला कविता

 ( बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )

 

 

जीवन आशा

 

नीले आकाश के अकाउण्ट में

अब और जमा नहीं हो रही है

स्वच्छ हवा ।

 

अकुलाहट से भरा मानव

खोज रहा है जीवन की समग्रता

लॉकर के गुमसुम अंधेरे में ।

 

इस कुहासे के छंटते ही

पुनः –

प्रकाश की पिपासा !

जीवन  की    आशा !

 

************

 

                                                          

 

 

 

 

 

 

3 Comments »

  1. कवि से कहिये प्रकाश की पिपासा, जीवन की आशा वो सब ठीक है मगर यह कुहासा जो है वो छंटनेवाला नहीं.. आपनार ओनुबाद किंतु भालो.. आर कोरुन.. छेंटे-छेंटे भालो गुलु बाइरे निये आशुन..

    Comment by प्रमोद सिंह — April 30, 2007 @ 12:34 pm

  2. अनुवादक और कवि दोनों को साधुवाद । कभी - कभी देवनागरी में बाँग्ला कविताएँ भी दी जा सकती हैं ? इसका यह मतलब नहीं कि काव्यानुवाद न हो ।

    Comment by अफ़लातून — April 30, 2007 @ 4:03 pm

  3. बढ़िया-अनुवाद में भी भाव उभर कर आ रहे हैं. बधाई!!

    Comment by समीर लाल — April 30, 2007 @ 11:09 pm

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