अनहद नाद

May 31, 2007

असमंजस

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:03 am

भवानी भाई की कविता

 

 

असमंजस

 

दुख की नदी तो

तैर कर पार की जा सकती है

आनंद के सागर का क्या होगा !

 

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( इदंनमम )

May 30, 2007

राजधानी में बैल - 6

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:29 am

 उदय प्रकाश

उदयप्रकाश की कविता

 

 

राजधानी में बैल - ६

 

आई.टी.ओ. पुल के पास

दिल्ली के सबसे व्यस्त चौराहे पर

खड़ा है बैल

 

उसे स्मृति में दिखते हैं

गोधूलि में जंगल से गांव लौटते

अपने पितर-पुरखे

 

उसकी आंखों के सामने

किसी विराट हरे समुद्र की तरह

फैला हुआ कौंधता है

चारागाह

 

उसके कानों में गूंजती रहती है

पुरखों के रंभाने की आवाजें

स्मृतियों से बार-बार उसे पुकारती हुई

उनकी व्याकुल टेर

 

बयालीस लाख या सैंतालीस लाख

कारों और वाहनों की रफ़्तार और हॉर्न के बीच

गहरे असमंजस में जड़ है वह

आई.टी.ओ. पुल के चौराहे से

कहां जाना चाहिए उसे

 

पितरों-पुरखों के गांव की ओर

जहां नहीं बचे हैं अब चारागाह

या फिर कनॉटप्लेस या पालम हवाई अड्डे की दिशा में

 

जहां निषिद्ध है सदा के लिए

उसका प्रवेश ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 29, 2007

राजधानी में बैल - 5

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:27 am

उदय प्रकाश 

उदयप्रकाश की कविता

 

राजधानी में बैल - ५

 

अपनी दोनों हथेलियों के बीचोंबीच

भर लो उसके कंधे का ककुद

 

और देर तक आंखें मूंदे थामे रहो

अपनी चेतना तक महसूस करते हुए

उसका स्पर्श

 

उसी तरह जैसे

हथेलियों की त्वचा और

हृदय के बीचोंबीच थामा जाता है

प्रेमिका का स्तन

 

क्या शिव है वह

उसकी देह पर उगा ?

 

एक अतिरिक्त सुंदरता

एक अतिरिक्त भार

देह के आकार के गढे जाने के दौरान

बची रह गई अतिरिक्त मिट्टी

जिसे रख दिया विधाता ने यों ही वहां

बिना कुछ सोचे ?

 

बैल और स्त्री

व्यर्थ है दोनों के लिए

उनकी देह की यह अतिरिक्त मात्रा

बताते हैं चिकित्सक

 

दुनिया के किसी भी बैल के कंधों पर

नहीं होता यह ककुद

इसीलिए मोहनजोदाड़ो के बैल के कंधों पर रखा गया

संसार का सबसे पहला जुआ

 

संसार में सबसे पहले धरती पर चला हल

सबसे पहले शुरु हुई जुताई

पुरातत्वविद बताते हैं

 

संसार में सबसे पहले बसे नगर

बैल के कंधे पर रखे ककुद

पर निर्भर

 

इतिहास जहां से शुरू होता था

उसके पहले छोर पर

खड़े थे

बैल और स्त्री

 

अपने-अपने ककुदों से रचने के लिए

सभ्यताओं का भविष्य ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 28, 2007

राजधानी में बैल - 4

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:32 am

उदय प्रकाश 

उदयप्रकाश की कविता

 

राजधानी में बैल - ४

 

पेसिफ़िक मॉल के ठीक सामने

सड़क के बीचोंबीच खड़ा है देर से

वह चितकबरा

 

उसकी अधमुंदी आंखों में निस्पृहता है अज़ब

किसी संत की

या फ़िर किसी ड्रग-एडिक्ट की

 

तीखे शोर , तेज़ रफ़्तार , आपाधापी  और उन्माद में

उसके दोनों ओर चलता रहता है

अनंत ट्रैफ़िक

 

घंटों से वह वहीं खड़ा है चुपचाप

मोहनजोदाड़ो की मुहर में उत्कीर्ण

इतिहास से पहले का वृषभ

या काठमांडू का नांदी

 

कभी-कभी बस वह अपनी गर्दन हिलाता है

किसी मक्खी के बैठने पर

 

उसके सींगों पर टिकी नगर सभ्यता कांपती है

उसके सींगों पर टिका आकाश थोड़ा-सा डगमगाता है

 

उसकी स्मृतियों में अभी तक हैं खेत

अपनी स्मृतियों की घास को चबाते हुए

उसके जबड़े से बाहर कभी-कभी टपकता है समय

झाग की तरह ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 24, 2007

राजधानी में बैल - 3

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:36 am

 उदय प्रकाश

उदयप्रकाश की कविता

 

राजधानी में बैल - ३

 

सूर्य सबसे पहले बैल के सींग पर उतरा

फिर टिका कुछ देर चमकता हुआ

हल की नोक पर

 

घास के नीचे की मिट्टी पलटता हुआ सूर्य

बार-बार दिख जाता था

झलक के साथ

जब-जब फाल ऊपर उठते थे

 

इस फसल के अन्न में

होगा

धूप जैसा आटा

बादल जैसा भात

हमारे घर के कुठिला में

इस साल

कभी न होगी रात ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 23, 2007

राजधानी में बैल - 1 व 2

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:54 am

 उदय प्रकाश

उदयप्रकाश की कविता

 

 

राजधानी में बैल

 

॥१॥

 

बादलों को सींग पर उठाए

खड़ा है आकाश की पुलक के नीचे

 

एक बूंद के अचानक गिरने से

देर तक सिहरती रहती है उसकी त्वचा

 

देखता हुआ उसे

भीगता हूं मैं

 

देर तक ।

 

 

॥२॥

 

एक सफ़ेद बादल

उतर आया है नीचे

सड़क पर

 

अपने सींग पर टांगे हुए आकाश

पृथ्वी को अपने खुरों के नीचे दबाए अपने वजन भर

आंधी में उड़ जाने से उसे बचाते हुए

 

बौछारें उसके सींगों को छूने के लिए

दौड़ती हैं एक के बाद एक

हवा में लहरें बनाती हुईं

 

मेरा छाता

धरती को पानी में घुल जाने से

बचाने के लिए हवा में फड़फड़ाता है

 

बैल को मैं अपने छाते के नीचे ले आना चाहता हूं

आकाश , पृथ्वी और उसे भीगने से बचाने के लिए

 

लेकिन शायद

कुछ छोटा है यह छाता ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 22, 2007

कितनी ही पीड़ाएं हैं……

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:54 am

गीत चतुर्वेदी की एक कविता

 

 

असंबद्ध

 

कितनी ही पीड़ाएं हैं

जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं

ऐसी भी होती है स्थिरता

जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं

 

सुबह ओस से निकलती है

मन को गीला करने की जिम्मेदारी उस पर है

शाम को झांकती है बारिश से

बचे-खुचे को भिगो जाती है

 

धूप धीरे-धीरे जमा होती है

कमीज और पीठ के बीच की जगह में

रह-रहकर झुलसाती है

 

माथा चूमना

किसी की आत्मा चूमने जैसा है

कौन देख पाता है

आत्मा के गालों को सुर्ख होते

 

दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना

एक खराब किस्म की कठोरता है ।

 

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( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

May 18, 2007

केवल एक बात थी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:18 am

कीर्ति चौधरी की एक कविता

 

 

केवल एक बात थी

 

केवल एक बात थी

कितनी आवृत्ति

विविध रूप में करके तुमसे कही

 

फिर भी हर क्षण

कह लेने के बाद

कहीं कुछ रह जाने की पीड़ा बहुत सही

 

उमग-उमग भावों की

सरिता यों अनचाहे

शब्द-कूल से परे सदा ही बही

 

सागर मेरे !    फिर भी

इसकी सीमा-परिणति

सदा तुम्हीं ने भुज भर गही, गही ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

May 16, 2007

सत्य को लिया सत्य की तरह

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 12:37 pm

मनीषा झा की एक कविता

 

 

 

सत्य को लिया सत्य की तरह

 

मैंने हवा को कहा हवा

तो वह नाराज़ हो गई

उसे अपना प्राण क्यों नहीं कहा

 

आखिर हर हवा को नहीं

भरा जा सकता अपनी सांसों में

 

पानी को लिया पानी की तरह ही

वह मेरे  पूरे वजूद में था

दो आंखों से लेकर

असंख्य रोमछिद्रों तक

पानी मन और आत्मा में  भी रहता था

 

खून,  खून है और पानी,  पानी

दोनों में अंतर है

जो अपनी जगह कायम है

 

मिट्टी , शरीर हो सकता है

मन और आत्मा नहीं

मन की दुनिया अलग होती है

वह विचरती है मिट्टी की दुनिया में

आत्मा की गति अलग होती है

मिट्टी की गति से

 

मैंने सत्य को लिया

सत्य की तरह ही

वजह यही है  कभी

प्रिय न हो सकी ।

 

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( युवा कवयित्री मनीषा झा उत्तर बंग विश्वविद्यालय,राजा राममोहनपुर{दार्जीलिंग}  में व्याख्याता हैं )

May 14, 2007

पढी हुई किताबें

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:36 pm

राजीव कुमार शुक्ल की एक कविता

 

 

पढी हुई किताबें

 

हमारे घर

पहली बार आया था

दोस्त मेरा बड़ा पुराना

नन्हीं बिटिया के करतब

बखान रही थी पत्नी

विस्मय-प्रसन्न दोस्त के आगे

 

सबसे ज्यादा तो

पुलकती है यह भाई साहब

इस आलमारी में रखी

किताबों को देख-देख

हां,कहती है

मां,ये सब पढूंगी मैं

मुस्कुराती व्याख्या की दोस्त ने

 

नहीं!

छलक कर बात काटी पत्नी ने

यह तो ऐसे हंसती है दुष्ट

कहती हो जैसे

मां,ये सब किताबें तो

पढी हुई हैं मेरी ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

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