फूल कुछ नहीं बताएंगे…….
नरेश सक्सेना की एक कविता
फूल कुछ नहीं बताएंगे
कितने फूलों से बनती है एक क्यारी
कितनी क्यारियों से एक बगीचा
और कितने बगीचों से बनती है
एक शीशी इत्र की
यह बताएंगे फूलों के व्यापारी
फूल कुछ नहीं बताएंगे
वे पड़े रहेंगे किसी घूरे पर
अपनी सूखी हुई काया
अपनी निचुड़ी हुई आत्मा
और अपनी उबली हुई आंखों से
सबको ताकते हुए चुपचाप
कहते हुए
कि आखिर खुशबुएं लुटाने तो हम आए ही थे
और इसके बावजूद
बार-बार आएंगे
उसी हिम्मत और अपनी खामोश खुद्दारी से
सबको शर्मसार करते हुए ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार
बात है
Comment by अभय तिवारी — May 4, 2007 @ 12:28 pm
अच्छी लगी कविता…
Comment by reetesh gupta — May 4, 2007 @ 2:44 pm
बढ़िया भाव हैं.
Comment by समीर लाल — May 4, 2007 @ 6:58 pm
वाह !
Comment by अनूप भार्गव — May 5, 2007 @ 12:44 am
बहुत अच्छा लगा इस कविता को पढ़ना!
Comment by अनूप शुक्ला — May 5, 2007 @ 1:56 am
सबको ताकते हुए चुपचाप
कहते हुए
कि आखिर खुशबुएं लुटाने तो हम आए ही थे
संदेश अच्छा है।रचना मे दार्शनिकता झलकती है,सुन्दर रचना है।
Comment by paramjitbali — May 5, 2007 @ 5:50 am