अनहद नाद

May 23, 2007

राजधानी में बैल - 1 व 2

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 11:54 am

 उदय प्रकाश

उदयप्रकाश की कविता

 

 

राजधानी में बैल

 

॥१॥

 

बादलों को सींग पर उठाए

खड़ा है आकाश की पुलक के नीचे

 

एक बूंद के अचानक गिरने से

देर तक सिहरती रहती है उसकी त्वचा

 

देखता हुआ उसे

भीगता हूं मैं

 

देर तक ।

 

 

॥२॥

 

एक सफ़ेद बादल

उतर आया है नीचे

सड़क पर

 

अपने सींग पर टांगे हुए आकाश

पृथ्वी को अपने खुरों के नीचे दबाए अपने वजन भर

आंधी में उड़ जाने से उसे बचाते हुए

 

बौछारें उसके सींगों को छूने के लिए

दौड़ती हैं एक के बाद एक

हवा में लहरें बनाती हुईं

 

मेरा छाता

धरती को पानी में घुल जाने से

बचाने के लिए हवा में फड़फड़ाता है

 

बैल को मैं अपने छाते के नीचे ले आना चाहता हूं

आकाश , पृथ्वी और उसे भीगने से बचाने के लिए

 

लेकिन शायद

कुछ छोटा है यह छाता ।

 

************

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

****

कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

Blog at WordPress.com.