उदयप्रकाश की कविता
राजधानी में बैल
॥१॥
बादलों को सींग पर उठाए
खड़ा है आकाश की पुलक के नीचे
एक बूंद के अचानक गिरने से
देर तक सिहरती रहती है उसकी त्वचा
देखता हुआ उसे
भीगता हूं मैं
देर तक ।
॥२॥
एक सफ़ेद बादल
उतर आया है नीचे
सड़क पर
अपने सींग पर टांगे हुए आकाश
पृथ्वी को अपने खुरों के नीचे दबाए अपने वजन भर
आंधी में उड़ जाने से उसे बचाते हुए
बौछारें उसके सींगों को छूने के लिए
दौड़ती हैं एक के बाद एक
हवा में लहरें बनाती हुईं
मेरा छाता
धरती को पानी में घुल जाने से
बचाने के लिए हवा में फड़फड़ाता है
बैल को मैं अपने छाते के नीचे ले आना चाहता हूं
आकाश , पृथ्वी और उसे भीगने से बचाने के लिए
लेकिन शायद
कुछ छोटा है यह छाता ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार
आप ने एक रहस्यवादी कवि की तरह रचना लिखी है अच्छा प्रयास है।बधाई।
By: paramjitbali on May 23, 2007
at 4:21 pm
प्रियंकर जी हिन्दी में कम ही ब्लॉग्स के सम्पर्क में मैं आया जिनमें साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित होती हों(हालाँकि ब्लॉग्स का उद्देश्य भावाभिव्यक्ति है सो किसी से कोई शिकायत जैसी बात नहीं) अतएव अच्छा लगता है आपके ब्लॉग में इन चीज़ों को पढ़-बाँचकर..
By: bhaskar on May 24, 2007
at 5:21 am
udai prakash ki bechaini bhari rachnaon me yah kavita ek apvaad si lagti hai. lekin yah jindagi aur duniya se udai ki betarah mohabbat hai jo barish me bheegte bail ki itni pyari aur concerned tasveer hamari ankhon ke aage kheenchti hai ki is drishy ko pahle ki tarah dekhkar andekha karna ab shayad hamare liye sambhav na rahe. kalam ki yahi taakat udai ko hamare daridr samay ki raahat banaati hai. itni pyari kavita padhaane ke liye aapko bahut-bahut dhanyvad.
By: chandrabhushan on May 24, 2007
at 6:48 am
उदय प्रकाश की रचनायें एक नयी दुनिया में ले जाती हैं। बधाई।
By: Zakir Ali 'Rajneesh' on May 26, 2007
at 6:16 am