अनहद नाद

May 24, 2007

राजधानी में बैल - 3

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 11:36 am

 उदय प्रकाश

उदयप्रकाश की कविता

 

राजधानी में बैल - ३

 

सूर्य सबसे पहले बैल के सींग पर उतरा

फिर टिका कुछ देर चमकता हुआ

हल की नोक पर

 

घास के नीचे की मिट्टी पलटता हुआ सूर्य

बार-बार दिख जाता था

झलक के साथ

जब-जब फाल ऊपर उठते थे

 

इस फसल के अन्न में

होगा

धूप जैसा आटा

बादल जैसा भात

हमारे घर के कुठिला में

इस साल

कभी न होगी रात ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

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