उदयप्रकाश की कविता
राजधानी में बैल – ३
सूर्य सबसे पहले बैल के सींग पर उतरा
फिर टिका कुछ देर चमकता हुआ
हल की नोक पर
घास के नीचे की मिट्टी पलटता हुआ सूर्य
बार-बार दिख जाता था
झलक के साथ
जब-जब फाल ऊपर उठते थे
इस फसल के अन्न में
होगा
धूप जैसा आटा
बादल जैसा भात
हमारे घर के कुठिला में
इस साल
कभी न होगी रात ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार
अच्छी कविता .. आपके चिट्ठे पर अक्सर आता हूँ पढ़ता भी हूँ पर टिपियाता नहीं क्योकि मुझे लगता है कि कविता को समझने के लिये जो समझ चाहिये वो मुझमे नहीं …पर आज कहीं आपका कमेंट पढ़ा कि कभी कभी कविता पर चिड़िया भी नहीं बीटती..तो सोचा कि मेरे को भी टिप्पणी करनी चाहिये…..:-)
बंगला के अनुवाद जब भी छापें तो यदि हो सके तो मूल बंगला कविता देवनागरी लिपि में छाप दें…तो मुझ जैसे बंगला समझने वालों को दोहरा मजा आ जायेगा.
By: kakesh on May 24, 2007
at 12:17 pm
कविता अच्छी लगी, धन्यवाद।
By: हेमेन्द्र कुमार राय on May 24, 2007
at 1:52 pm
ईश्वर करे किसी की कुठिला में कभी न हो रात. आशा से भरी छोटी किन्तु संपूर्ण रचना. बधाई रचनाकार उदय प्रकाश जी.
By: समीर लाल on May 24, 2007
at 5:10 pm
बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।
By: paramjitbali on May 24, 2007
at 5:30 pm
बहुत खूब लिखा है उदयप्रकाशजी ने! आपने हमे पढ़ाया इसके लिये शुक्रिया!
By: अनूप शुक्ल on May 24, 2007
at 5:33 pm
कितनी छोटी आवश्यकतायें हैं. मेरी भी ऐसी होतीं तो मैं दुनियां में सबसे सुखी व्यक्ति होता.
By: ज्ञानदत्त पाण्डेय on May 25, 2007
at 10:14 am