राजधानी में बैल - 5
उदयप्रकाश की कविता
राजधानी में बैल - ५
अपनी दोनों हथेलियों के बीचोंबीच
भर लो उसके कंधे का ककुद
और देर तक आंखें मूंदे थामे रहो
अपनी चेतना तक महसूस करते हुए
उसका स्पर्श
उसी तरह जैसे
हथेलियों की त्वचा और
हृदय के बीचोंबीच थामा जाता है
प्रेमिका का स्तन
क्या शिव है वह
उसकी देह पर उगा ?
एक अतिरिक्त सुंदरता
एक अतिरिक्त भार
देह के आकार के गढे जाने के दौरान
बची रह गई अतिरिक्त मिट्टी
जिसे रख दिया विधाता ने यों ही वहां
बिना कुछ सोचे ?
बैल और स्त्री
व्यर्थ है दोनों के लिए
उनकी देह की यह अतिरिक्त मात्रा
बताते हैं चिकित्सक
दुनिया के किसी भी बैल के कंधों पर
नहीं होता यह ककुद
इसीलिए मोहनजोदाड़ो के बैल के कंधों पर रखा गया
संसार का सबसे पहला जुआ
संसार में सबसे पहले धरती पर चला हल
सबसे पहले शुरु हुई जुताई
पुरातत्वविद बताते हैं
संसार में सबसे पहले बसे नगर
बैल के कंधे पर रखे ककुद
पर निर्भर
इतिहास जहां से शुरू होता था
उसके पहले छोर पर
खड़े थे
बैल और स्त्री
अपने-अपने ककुदों से रचने के लिए
सभ्यताओं का भविष्य ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार