Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:01 am
अल्पना मिश्र की एक कविता
मैं
समय की कमी थी बहुत
मेरे समूचे वजन से भारी थीं
काम की गठरियां
गांठों में बंधा था
टुकड़ा-टुकड़ा मेरा आप
शोक मोह चिंता और हर्ष से बना
बेखबर ईश्वर बैठा था स्कूटी पर
मेरे पीछे
मैं जाने किस शोक में डूबी
किस मोह में हिम्मत धरती
किस चिंता में कांपती
किस हर्ष के लिए विकल
हाथों में मन भर अनाज लादे
भीड़ के बीच
स्कूटी चला रही थी ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:18 am
युवा कवि निशांत की एक कविता
उस रात
उनके झगड़े के बीच
एक मुर्गी गवाह थी
वे लड़के कहीं से उठा लाए थे दालचीनी
जिसकी घिसी हुई थी पीठ
कहीं से लाए थे हल्दी
जो पीली पड़ चुकी थी
लहसुन सफ़ेद हो गया था सूखकर
उनके बालों की तरह
उस रात जमकर वे एक-दूसरे पर बरसे
जमकर खाया जमकर पिया
और जमकर नाचे
उस रात जमकर उन्होंने ज़िन्दगी को जिया
स्मृति में बसी एक रात की तरह
और अलविदा हुए जैसे अलविदा होती हैं स्मृतियां
उस रात काले हो चुके थे उनके सफ़ेद बाल
जैसे काला हो जाता है विश्वास
अक्सर रातों में
और सूर्य की रौशनी में
वे नहीं देखना चाहते थे एक-दूसरे के चेहरे
वे अलविदा हुए
स्मृति में बसी उस रात की तरह
और उनके झगड़े के बीच
एक मुर्गी गवाह थी ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:26 pm
अनूप मुखर्जी की दो बांग्ला कविताएं
(बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर)
१.
प्रणाम करो………
प्रणाम करो रात्रि को
यही शुभ है
प्रणाम करो अंधकार को
यही आवरण है
प्रणाम करो अश्रु को
यही स्वेद है
प्रणाम करो मिट्टी को
यही देह है
प्रणाम करो जीवन को
यही आसक्ति है
प्रणाम करो मृत्यु को
यही आरम्भ है……..
२.
किसका देश कैसा प्रेम
किसका देश कैसा प्रेम
सब मिल के खाएं
प्रेम-पखेरू हुआ उड़नछू
तूतू मैंमैं गाएं
जाते हैं, जाएं
जहन्नुम में
संग में राम-सीता
नरक घूम कर
बिछा दूंगा
शैतान के आगे गीता ।
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