अनहद नाद

May 12, 2007

समय की कमी थी बहुत

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:01 am

अल्पना मिश्र की एक कविता

 

मैं

 

समय की कमी थी बहुत

मेरे समूचे वजन से भारी थीं

काम की गठरियां

गांठों में बंधा था

टुकड़ा-टुकड़ा मेरा आप

 

शोक मोह चिंता और हर्ष से बना

बेखबर ईश्वर बैठा था स्कूटी पर

मेरे पीछे

 

मैं जाने किस शोक में डूबी

किस मोह में हिम्मत धरती

किस चिंता में कांपती

किस हर्ष के लिए विकल

हाथों में मन भर अनाज लादे

 

भीड़ के बीच

स्कूटी चला रही थी ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

May 11, 2007

बूढी औरत का एकांत

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 4:46 am

शुभा की एक कविता

 

 

बूढी औरत का एकांत

 

बूढी औरत को

पानी भी रेत की तरह दिखाई देता है

कभी-कभी वह ठंडी सांस छोड़ती है

तो याद करती है

बचपन में उसे रेत

पानी की तरह दिखाई देती थी ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

May 8, 2007

उनके झगड़े के बीच एक मुर्गी गवाह थी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:18 am

युवा कवि निशांत की एक कविता

 

 

उस रात

 

उनके झगड़े के बीच

एक मुर्गी गवाह थी

 

वे लड़के कहीं से उठा लाए थे दालचीनी

जिसकी घिसी हुई थी पीठ

 

कहीं से लाए थे हल्दी

जो पीली पड़ चुकी थी

 

लहसुन सफ़ेद हो गया था सूखकर

उनके बालों की तरह

 

उस रात जमकर वे एक-दूसरे पर बरसे

जमकर खाया जमकर पिया

और जमकर नाचे

 

उस रात जमकर उन्होंने ज़िन्दगी को जिया

स्मृति में बसी एक रात की तरह

और अलविदा हुए जैसे अलविदा होती हैं स्मृतियां

 

उस रात काले हो चुके थे उनके सफ़ेद बाल

जैसे काला हो जाता है विश्वास

अक्सर रातों में

और सूर्य की रौशनी में

वे नहीं देखना चाहते थे एक-दूसरे के चेहरे

 

वे अलविदा हुए

स्मृति में बसी उस रात की तरह

और उनके झगड़े के बीच

एक मुर्गी गवाह थी ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

May 4, 2007

फूल कुछ नहीं बताएंगे…….

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 9:44 am

नरेश सक्सेना 

नरेश सक्सेना की एक कविता 

 

फूल कुछ नहीं बताएंगे

 

कितने फूलों से बनती है एक क्यारी

कितनी क्यारियों से एक बगीचा

और कितने बगीचों से बनती है

एक शीशी इत्र की

यह बताएंगे फूलों के व्यापारी

 

फूल कुछ नहीं बताएंगे

 

वे पड़े रहेंगे किसी घूरे पर

अपनी सूखी हुई काया

अपनी निचुड़ी हुई आत्मा

और अपनी उबली हुई आंखों से

सबको ताकते हुए चुपचाप

कहते हुए

कि आखिर खुशबुएं लुटाने तो हम आए ही थे

और इसके बावजूद

बार-बार आएंगे

उसी हिम्मत और अपनी खामोश खुद्दारी से

सबको शर्मसार करते हुए ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

May 1, 2007

दो बांग्ला कविताएं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:26 pm

 अनूप मुखर्जी की दो बांग्ला कविताएं

(बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर)

 

१. 

प्रणाम करो………

 

प्रणाम करो रात्रि को

यही शुभ है

प्रणाम करो अंधकार को

यही आवरण है

प्रणाम करो अश्रु को

यही स्वेद है

प्रणाम करो मिट्टी को

यही देह है

प्रणाम करो जीवन को

यही आसक्ति है

प्रणाम करो मृत्यु को

यही आरम्भ है……..

 

 

२.

 

किसका देश कैसा प्रेम

 

किसका देश कैसा प्रेम

सब मिल के खाएं

प्रेम-पखेरू हुआ उड़नछू

तूतू मैंमैं गाएं

 

जाते हैं,  जाएं

जहन्नुम में

संग में राम-सीता

नरक घूम कर

बिछा दूंगा

शैतान के आगे गीता ।

 

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