तारों से भरा आसमान ऊपर
भवानी भाई की एक कविता
तारों से भरा आसमान ऊपर
तारों से भरा आसमान ऊपर
हृदय से हरा आदमी भू पर
होता रहता हूं रोमांचित
वह देख कर यह छूकर ।
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भवानी भाई की एक कविता
तारों से भरा आसमान ऊपर
तारों से भरा आसमान ऊपर
हृदय से हरा आदमी भू पर
होता रहता हूं रोमांचित
वह देख कर यह छूकर ।
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( अभी इसी छब्बीस को यानी परसों, भाई अनूप शुक्ल का हमारे घर अर्थात लेक रोड स्थित सीएसआईआर के फ़्लैट नम्बर ४३ में आना हुआ . उनसे मिलना हुआ और ढेर सारी बातें हुईं . उनकी मिलनसारिता और पारस्परिकता ने मन पर विशेष प्रभाव छोड़ा . अनूप भाई के साथ हुई उस बैठक पर यूं तो आपका एक पोस्ट का हक बनता है ,पर फ़िलवक्त भवानी भाई की यह कविता प्रस्तुत है )

अबके
मुझे पंछी बनाना अबके
या मछली
या कली
और बनाना ही हो आदमी
तो किसी ऐसे ग्रह पर
जहां यहां से बेहतर आदमी हो
कमी और चाहे जिस तरह की हो
पारस्परिकता की न हो !
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श्यामल शील की एक बांग्ला कविता
हिन्दी अनुवाद : प्रियंकर
राक्षस
चाहिए चाहिए चाहिए … सब कुछ चाहिए , शव चाहिए
युद्ध के लिए ज़मीन ज़मीन के लिए युद्ध
चाहिए सौरतंत्र , रक्त , तुम्हारा मुकुट , तुम्हारा सुंदर परिधान
राजपुत्र लड़ेगा , लड़ेगा मंत्रीपुत्र , कोतवाल का बेटा
सेनापति सिंहासन पर रख गया जादूई तलवार —
तुम्हारे ही पोषण से पुष्ट है तुम्हारा हत्यारा
सर्वग्रासी महत्वाकांक्षा की मायाकुंडली
पाना चाहता हूं पैर जमाने के लिए नए अक्षांश
चाहिए असीमित अधिकार भले ही वे मिथ्या स्वप्न जैसे हों
समय के प्रति जाग रही है तीव्र लालसा
भविष्य को चाहता हूं अभी अपनी हथेली पर
आकाश जैसा मुंह फाड़कर चटखारे मारते हुए
निगल जाना चाहता हूं समूची पृथ्वी ।
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(बांग्ला लघु पत्रिका हवा४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर केन्द्रित अंक ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ से साभार )
राग तेलंग की एक कविता
उत्तरीय
हे! गणनायक
अपना उत्तरीय अब उतार लो और
थकान दूर कर लो
इस निर्जन वन में वृक्ष के नीचे
अब यहां तुम्हें
तुम्हारी असल सूरत में देखने वाला कोई नहीं है
याद करो यहीं से चले थे तुम
तब तुम्हारे कंधे पर गमछा हुआ करता था
तब तुम पसीना बहाने के बजाय दूसरा रास्ता खोजा करते थे
अब तुम्हें भाती है रथ की सवारी और
ऐसे सारथी भी जो तुम्हारी हां में हां मिलाएं
हे! माननीय
अपना उत्तरीय अब उतार लो और
अपना तूणीर भी
तुम्हारे बाण अब खत्म हो चुके हैं और तुम निःशस्त्र हो चुके हो
देखो जो तुमने रचा था वातावरण
वहां कुछ भी नहीं है सिवाय उन लाशों के
जिनकी तुम इरादतन हत्या करना चाहते थे
जिन्हें तुमने मारा दूसरी तरह का षडयंत्र रचकर
हे! उदारमना कहलाने वाले
अपना उत्तरीय अब उतार लो और मुखौटा भी
अब तुमसे चला नहीं जाएगा आगे
बैठ जाओ यहीं सर्वधर्म-समभाव की धरती पर
विवशतापूर्ण रहे तुम्हारे जीवन का उत्तरार्ध
इससे अच्छा होगा कि तुम अपनी अंतरात्मा की बात बोल दो
खाली हो लो कहकर अपने अन्तर्मन का द्वंद्व
तुम्हें क्षमादान की इच्छा रखता है यह जन
उतार लो अपना उत्तरीय
और जनसत्ता को प्रणाम कर लो योद्धाओ !
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
रंजीत कुमार राय की बांग्ला कविता
अनुवाद : प्रियंकर
बिखरती पहचान
नदियों को जोड़ने के पहले
जुड़ना होगा नदी से
नदी पत्थरों को भेद कर आती है
आकार देती है पत्थरों
अब नदी के रास्ते में हैं कंक्रीट के पत्थर
गति के संधान में पहुंच गए मंगल तक
नदी की गति में पैदा किए अवरोध
महाकाश को जानने की उत्कट अभिलाषा
दूर और दूर पहुंचे पड़ोसी से
पानी पत्थर महाकाश – लगता है जैसे
जान लिया सब कुछ … पृथ्वी का समूचा रहस्य
अपनी पहचान को ऊंचाई देने में
रौंद डाले औरों को पहचानने के सारे मार्ग ।
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(बांग्ला लघु पत्रिका हवा४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर केन्द्रित अंक ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ से साभार )
भगवत रावत द्वारा रचित एक समूह गीत
हमने चलती चक्की देखी
हमने चलती चक्की देखी
हमने सब कुछ पिसते देखा
हमने चूल्हे बुझते देखे
हमने सब कुछ जलते देखा
हमने देखी पीर पराई
हमने देखी फटी बिवाई
हमने सब कुछ रखा ताक पर
हमने ली लम्बी जमुहाई
हमने देखीं सूखी आंखें
हमने सब कुछ बहते देखा
कोरे हड्डी के ढांचों से
हमने तेल निकलते देखा
हमने धोका ज्ञान पुराना
अपने मन का कहना माना
पहले अपनी जेब संभाली
फ़िर दी सारे जग को गाली
हमने अपना फ़र्ज़ निभाया
राष्ट्र-पर्व पर गाना गाया
हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
आपस में सब भाई-भाई ।
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( ‘हमने उनके डर देखे ‘ काव्य संकलन से साभार )
मनमोहन की एक कविता
बरखास्त
फूल के खिलने का डर है
सो पहले फूल का खिलना बरखास्त
फिर फूल बरखास्त
हवा के चलने का डर है
सो हवा का चलना बरखास्त
फिर हवा बरखास्त
डर है पानी के बहने का
सीधी-सी बात
पानी का बहना बरखास्त
न काबू आए तो पानी बरखास्त
सवाल उठने का सवाल ही नही
सवाल का उठना बरखास्त
सवाल उठाने वाला बरखास्त
यानी सवाल बरखास्त
असहमति कोई है तो असहमति बरखास्त
असहमत बरखास्त
और फिर सभा बरखास्त
जनता का डर
तो पूरी जनता बरखास्त
किले में बंद हथियारबंद खौफ़जदा
बौना तानाशाह चिल्लाता है
बरखास्त बरखास्त
रातों को जगता है चिल्लाता है
खुशबू को गिरफ़्तार करो
उड़ते पंछी को गोली मारो ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
पवन मुखोपाध्याय की एक कविता
( बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )
रोटी और गुलाब
हज़ारों सूने रसोईघरों और बंद कल-कारखानों से
एक सहज रोज़मर्रा के दिन की ओर
जहां चाहिए रोटी और गुलाब दोनों
जब तक शेष है हमारी जीवंतता
भूखा पेट और भूखा मन चाहता है
रोटी और गुलाब दोनों ही …
भूख का गीत और संगीत जीवन ने अर्जित किया
सौंदर्य और प्रेम से परे नहीं है भूख
जैसे जन्म देने के लिए नारी झेलती है यंत्रणा
भूख और सौंदर्य दोनों के लिए लड़ते रहे हैं लोग
रोटी और गुलाब के बीच जीवन कहीं बंट जाता है
कहीं अलग-सा लगता है
हाथ बंटाना होगा इसी दुविधा के बीच
इस बार भी ….
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( बांग्ला लघु पत्रिका हवा४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर केन्द्रित अंक ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ से साभार )
भगवत रावत की एक कविता
हमने उनके घर देखे
हमने उनके घर देखे
घर के भीतर घर देखे
घर के भी तलघर देखे
हमने उनके
डर देखे ।
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प्रियंकर की एक कविता
वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि
मैं हाशिये का कवि हूं
मेरी आत्मा के राग का आरोही स्वर
केन्द्र के कानों तक नहीं पहुंचता
पर पहुंच ही जाते हैं मुझ तक
केन्द्र की विकासमूलक कार्य-क्रीड़ाओं के अभिलेख
केन्द्र के अपने राजकीय कवि हैं
– प्यारे ‘पोएट लॉरिएट’
केन्द्रीय मह्त्व के मुद्दों पर
पूरे अभिजात्य के साथ
सुविधाओं का अध्यात्म रचते
जनता के सुख-दुख की लोल-लहरों से
यथासंभव मिलते-बचते
हाशिए के इस अनन्य राग के
विलंबित विस्तार में
मेरे संगतकार हैं
जीवन के पृष्ठ-प्रदेश में
करघे पर कराहते बीमार बुनकर
रांपी टटोलते बुजुर्ग मोचीराम
गाड़ी हांकते गाड़ीवान
खेत गोड़ते-निराते
और निश्शब्द
उसी मिट्टी में
गलते जाते किसान
मेरी कविता के ताने-बाने में गुंथी है
उनकी दर्दआमेज़ दास्तान
दादरी से सिंगूर तक फैले किसानों का
विस्थापन रिसता है मेरी कविता से
उनके दुख से भीगी सड़क पर
मुझसे कैसे चल सकेगी
एक लाख रुपये की कार
निजीकरण और मॉलमैनिया के इस
मस्त-मस्त समय में
देरी दूरी और दहशत के बावजूद
सार्वजनिक वाहन के भरोसे बैठे
हाशिये के कवि को
अपने पैरों पर भरोसा
नहीं छोड़ना चाहिये ।
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