Posted by: PRIYANKAR | June 1, 2007

स्त्रीवग्गो

ऋतुराज की एक कविता

 

 

स्त्रीवग्गो

 

रात्रि विश्राम से पहले चलते-चलते जहां रुकना होगा

वह चाहेगी कि मैं उसे पूरी कथा सुनाऊं

 

अंधेरा घिर जाने से पहले भोजन बन जाना चाहिए

बिस्तर सजने पर पालथी मार कर बैठना होगा

फिर कथा कहनी होगी अपने अनगिनत भटकावों की

एक दिन का पूरा वृत्तांत लोगों से छिपते हुए

सुनाना होगा सिर्फ़ एक श्रोता स्त्री को

कहने होंगे निद्रा से पहले के सभी स्वप्न

जिनमें वह गायब होगी

 

जेतवन में बात फैल चुकी है कि शास्ता थके-हारे

रात्रि विश्राम के लिए रुके हैं

और एक स्त्री को स्त्री होने का विशेषाधिकार

मिलने वाला है

 

कुटिया के बाहर भीड़ बढती जा रही है

दीपक बुझा दो देवी मैं अंधेरे में ही फुसफुसाते हुए

तुम्हें मुक्तिमार्ग का ज्ञान दूंगा

यह इतना नीरस उपक्रम है कि शायद तुम ऊंघने लगो

मैं तुम्हारे दोनों कंधों का स्पर्श कर तुम्हें जगाता रहूंगा

किसी न किसी तरह यह महारात्रि व्यतीत हो ही जाएगी ।

 

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Responses

  1. प्रियंकर जी आप मेरे ब्लोग पर आये बहुत-बहुत शुक्रिया…
    मै आपके ब्लोग पर पहली बार आई हूँ…बहुत गहरे भाव है कविता में…

    सुनीता (शानू)

  2. ऋतुराज जी की यह गूढ़ कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद।


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