बरखास्त
मनमोहन की एक कविता
बरखास्त
फूल के खिलने का डर है
सो पहले फूल का खिलना बरखास्त
फिर फूल बरखास्त
हवा के चलने का डर है
सो हवा का चलना बरखास्त
फिर हवा बरखास्त
डर है पानी के बहने का
सीधी-सी बात
पानी का बहना बरखास्त
न काबू आए तो पानी बरखास्त
सवाल उठने का सवाल ही नही
सवाल का उठना बरखास्त
सवाल उठाने वाला बरखास्त
यानी सवाल बरखास्त
असहमति कोई है तो असहमति बरखास्त
असहमत बरखास्त
और फिर सभा बरखास्त
जनता का डर
तो पूरी जनता बरखास्त
किले में बंद हथियारबंद खौफ़जदा
बौना तानाशाह चिल्लाता है
बरखास्त बरखास्त
रातों को जगता है चिल्लाता है
खुशबू को गिरफ़्तार करो
उड़ते पंछी को गोली मारो ।
*************
( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
खुश्बू रहे, थोड़ी बदबू के साथ भी नहीं तो खुश्बू का मोल ही क्या बचेगा.
हवा चले, पानी बहे, सवाल उठे और जबाब भी मिलें, सहमति और असहमति दोंनों साथ बैठकर चाय पियें.
क्या एसा नहीं हो सकता?
Comment by dhurvirodhi — June 15, 2007 @ 2:42 pm
धुरविरोधी ने उठाया सवाल जो है विरोध,
सवाल बरखास्त, विरोध बरखास्त
यानि धुरविरोधी बरखास्त
वैसा हो नहीं सकता इसलिए ऐसा होगा
Comment by masijeevi — June 15, 2007 @ 2:50 pm
ज्ञानपरक कविता…आत्ममंथन के लिए सचमुच जरुरी है…।
Comment by divyabh — June 15, 2007 @ 3:03 pm
सही समय पर सही कविता । अच्छा लगा । अब टिप्पणी बरखास्त ।
Comment by yunus — June 15, 2007 @ 3:20 pm
शानदार कविता.. गरम लोहे पर चोट..
Comment by अभय तिवारी — June 15, 2007 @ 3:46 pm
क्या बात है.मौके पर कही गई बात लोगों के दिल तक पहुंचती है.ये सारी बातें एक समाज मे पनपतीं हैं. सो…ये समाज भी बर्खास्त. बचा रह गया शून्य बटा सन्नाटा… किसी के मिमियाने की आवाज़ आ रही है देखूं या बर्खास्त करुं…..
Comment by vimal verma — June 15, 2007 @ 4:08 pm
बर्खास्त तो केवल भय होना चाहिये. विक्तोर फ्रेंकल नात्सी कैम्प में भी सबसे स्वतंत्र व्यक्ति थे. जो कविता भय और नैराश्य बढ़ाये वह बर्खास्त होनी चाहिये.
Comment by Gyandutt Pandey — June 15, 2007 @ 10:30 pm
प्रियकंर जी बातों -२ मे तीर बहुत दूर तक आप लगा गये और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर भी करते हुये.
Comment by DR PRABHAT TANDON — June 15, 2007 @ 11:22 pm
बड़ी बेहतरीन कविता और कुछ अभी के माहौल के साथ सामन्जस्य बैठाने की कोशिश करती.
Comment by समीर लाल — June 16, 2007 @ 1:16 am
हार्दिक शुभकामना । मनमोहन और आपको साधुवाद के साथ इस कविता चिट्ठे पर भवानीबाबू की याद
निर्भय मन
बुद्धि को तेजस्वी बनाने का
एक ही रास्ता है
कि हम हठपूर्वक कुछ तय न करें
खुला रखें अपना मन
मन में विचार हवा की तरह
आयें - जायें
तुफान उठायें
हम भय न करें
निर्भय मन द्विविधा का लय कर देता है
बिना किसी दुराग्रह के
पथ तय कर लेता है
भवानीप्रसाद मिश्र
Comment by अफ़लातून — June 16, 2007 @ 6:47 am
“”..जो कविता भय और नैराश्य बढ़ाये वह बर्खास्त होनी चाहिये”"..
समाज, समय व जनविरोधी ऐसी टिप्पणी बर्खास्त!
Comment by प्रमोद सिंह — June 16, 2007 @ 9:02 am