Posted by: PRIYANKAR | June 25, 2007

नदियों को जोड़ने के पहले

रंजीत कुमार राय की बांग्ला कविता

अनुवाद  :  प्रियंकर

 

 

बिखरती पहचान

 

नदियों को जोड़ने के पहले

जुड़ना होगा नदी से

 

नदी पत्थरों को भेद कर आती है

आकार देती है पत्थरों

अब नदी के रास्ते में हैं कंक्रीट के पत्थर

 

गति के संधान में पहुंच गए मंगल तक

नदी की गति में पैदा किए अवरोध

महाकाश को जानने की उत्कट अभिलाषा

दूर और दूर पहुंचे पड़ोसी से

 

पानी पत्थर महाकाश  –  लगता है जैसे

जान लिया सब कुछ …  पृथ्वी का समूचा रहस्य

अपनी पहचान को ऊंचाई देने में

रौंद डाले औरों को पहचानने के सारे मार्ग ।

 

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 (बांग्ला लघु पत्रिका हवा४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर केन्द्रित अंक ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ से साभार )


Responses

  1. एक अच्छी कविता को सबके सामने पेश करने के लिए बधाई। सही है। हमने नदी को अपना नहीं समझा, सिर्फ उसका दोहन किया और करते जा रहे हैं। किसी भी नदी को उठा लीजिए-सब बदहाल हैं।

  2. सुन्दर अनुवाद पढ़ कर मूल का कविता अनुमान लगायें । रंजीत क्या उत्तर बंगाल के हैं?उनका पता दीजिए।

  3. really a very nice poem it realy helped me a lot to get good remarks fron my teacher


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