Posted by: PRIYANKAR | June 26, 2007

हे! गणनायक

राग तेलंग की एक कविता

 

उत्तरीय

 

हे! गणनायक

अपना उत्तरीय अब उतार लो और

थकान दूर कर लो

इस निर्जन वन में वृक्ष के नीचे

अब यहां तुम्हें

तुम्हारी असल सूरत में देखने वाला कोई नहीं है

 

याद करो यहीं से चले थे तुम

तब तुम्हारे कंधे पर गमछा हुआ करता था

तब तुम पसीना बहाने के बजाय दूसरा रास्ता खोजा करते थे

अब तुम्हें भाती है रथ की सवारी और

ऐसे सारथी भी जो तुम्हारी हां में हां मिलाएं

 

हे! माननीय

अपना उत्तरीय अब उतार लो और

अपना तूणीर भी

तुम्हारे बाण अब खत्म हो चुके हैं और तुम निःशस्त्र हो चुके हो

देखो जो तुमने रचा था वातावरण

वहां कुछ भी नहीं है सिवाय उन लाशों के

जिनकी तुम इरादतन हत्या करना चाहते थे

जिन्हें तुमने मारा दूसरी तरह का षडयंत्र रचकर

 

हे! उदारमना कहलाने वाले

अपना उत्तरीय अब उतार लो और मुखौटा भी

अब तुमसे चला नहीं जाएगा आगे

बैठ जाओ यहीं सर्वधर्म-समभाव की धरती पर

विवशतापूर्ण रहे तुम्हारे जीवन का उत्तरार्ध

इससे अच्छा होगा कि तुम अपनी अंतरात्मा की बात बोल दो

खाली हो लो कहकर अपने अन्तर्मन का द्वंद्व

तुम्हें क्षमादान की इच्छा रखता है यह जन

 

उतार लो अपना उत्तरीय

और जनसत्ता को प्रणाम कर लो योद्धाओ !

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )


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