Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:56 am
मेरा दुख
मैं सिंगूर पर दुखी नहीं हूं
मैं दुखी हूं
इस देश के शरीर पर
फोड़ों की तरह उगते सिंगूरों पर
मेरी चिंता का विषय है
इस कृषिप्रधान देश का सिंगूरीकरण
कटहल-कौहंड़े वाले इस देश का अंगूरीकरण
अब दुआ से नहीं बचेगा मरीज़
पर यह भी तो नहीं मालूम
दवा से होगा कुछ लाभ
या शल्य-चिकित्सा से ही
संभव हो सकेगा रोग का उपचार ।
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Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:23 am

भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता
सिद्धांत और विवेक
सिद्धांतों ने मेरे विवेक को
कुतरने की कोशिश की
इसलिए मैंने सिद्धांतों के दांतों को
जरा और पास से परखा
सिद्धांत तब मुझे कुरूप दिखे
मैंने देखा कि उन्हें मेरे भीतर
किसी ने बड़े कौशल के साथ
धंसा दिया है चुपचाप
जिनकी मेरे विवेक से
कोई संगति नहीं है
उन्हें मेरे विवेक में बनाकर घोंसले
यों बसा दिया है
कि अब वे वहां अंडे देते हैं
और बढाते चलते हैं
अपना परिवार
मैं चौकन्ना हो गया हूं
और सिद्धांत मेरे सामने जब
पेश किया जाता है कोई
तो मैं उसके चेहरे को नहीं देखता
उससे कहता हूं मुंह खोलो
और अपने दांत दिखाओ
तुम्हारे दांतों में
खून तो नहीं लगा है
इसके या उसके विवेक का
किसी एक का भी विवेक
हज़ारों लोगों के तय किये हुए
सिद्धांत से ज्यादा पवित्र है
प्यारा है
विवेक ध्रुवतारा है
सिद्धांत एक लकीर पिटी हुई
मैं सिद्धांतॊं की तरफ़
चौकन्ना हो गया हूं
नियमवादियों ने मुझे
भवानीप्रसाद मिश्र तय किया था
अपनी बेटी के बल पर मैं
मन्ना हो गया हूं ।
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Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:51 am

राजेन्द्र उपाध्याय की एक कविता
चिट्ठियां
चिट्ठियां रही हैं हमेशा मेरे घर में
लोहे के एक तार से बंधी हुई
चिट्ठियों से झांकते हैं चेहरे
ससुराल में दुख पा रही बहनों के
दो-दो बेटों के बाप बन गए दोस्तों के
खुश-खुश फूल बांटती हुई लड़कियों के
चिट्ठियों से झांकते हैं दुख गहरे
आंसू अवसाद विषाद
करुणा समाई हुई चिट्ठियों में
तार बंधी हुई चिट्ठियों में ।
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( समकाली सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )