अनहद नाद

June 7, 2007

प्रियंकर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:56 am

मेरा दुख 

 

मैं सिंगूर पर दुखी नहीं हूं

मैं दुखी हूं

इस देश के शरीर पर

फोड़ों की तरह उगते सिंगूरों पर

 

मेरी चिंता का विषय है

इस कृषिप्रधान देश का सिंगूरीकरण

कटहल-कौहंड़े वाले इस देश का अंगूरीकरण

 

अब दुआ से नहीं बचेगा मरीज़

पर  यह भी तो नहीं मालूम

दवा से होगा कुछ लाभ

या शल्य-चिकित्सा से ही

संभव हो सकेगा  रोग का  उपचार ।

 

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June 6, 2007

विवेक ध्रुवतारा है ….

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:23 am

 Bhavani bhai

भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता

 

 

सिद्धांत और विवेक

 

सिद्धांतों ने मेरे विवेक को

कुतरने की कोशिश की

 

इसलिए मैंने सिद्धांतों के दांतों को

जरा और पास से परखा

 

सिद्धांत तब मुझे कुरूप दिखे

 

मैंने देखा कि उन्हें मेरे भीतर

किसी ने बड़े कौशल के साथ

धंसा दिया है चुपचाप

जिनकी मेरे विवेक से

कोई संगति नहीं है

 

उन्हें मेरे विवेक में बनाकर घोंसले

यों बसा दिया है

कि अब वे वहां अंडे देते हैं

और बढाते चलते हैं

अपना परिवार

 

मैं चौकन्ना हो गया हूं

और सिद्धांत मेरे सामने जब

पेश किया जाता है कोई

तो मैं उसके चेहरे को नहीं देखता

 

उससे कहता हूं मुंह खोलो

और अपने दांत दिखाओ

 

तुम्हारे दांतों में

खून तो नहीं लगा है

इसके या उसके विवेक का

 

किसी एक का भी विवेक

हज़ारों लोगों के तय किये हुए

सिद्धांत से ज्यादा पवित्र है

प्यारा है

 

विवेक ध्रुवतारा है

सिद्धांत एक लकीर पिटी हुई

मैं सिद्धांतॊं की तरफ़

चौकन्ना हो गया हूं

 

नियमवादियों ने मुझे

भवानीप्रसाद मिश्र तय किया था

अपनी बेटी के बल पर मैं

मन्ना हो गया हूं ।

 

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June 5, 2007

आंखें

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 5:25 am

मंगलेश डबराल

मंगलेश डबराल की एक कविता

 

 

आंखें

 

आंखें संसार के सबसे सुंदर दृश्य हैं

इसीलिए उनमें दिखने वाले दृश्य और भी सुंदर हो उठते हैं

उनमें एक पेड़ सिहरता है एक बादल उड़ता है  नीला रंग प्रकट होता है

सहसा अतीत की कोई चमक लौटती है

या कुछ ऐसी चीज़ें झलक उठती हैं जो दुनिया में अभी आने को हैं

वे दो पृथ्वियों की तरह हैं

प्रेम से भरी हुई जब वे दूसरी आंखों को देखती हैं

तो देखते ही देखते कट जाते हैं लंबे और बुरे दिन

 

यह एक पुरानी कहानी है

कौन जानता है इस बीच उन्हें क्या-क्या देखना पड़ा

और दुनिया में सुंदर चीज़ें किस तरह नष्ट होती चली गईं

अब उनमें दिखता है एक ढहा हुआ घर कुछ हिलती-डुलती छायाएं

एक पुरानी लालटेन जिसका कांच काला पड़  गया है

वे प्रकाश सोखती रहती हैं कुछ नहीं कहतीं

सतत आश्चर्य में खुली रहती हैं

चेहरे पर शोभा की वस्तुएं किसी विज्ञापन में सजी हुई ।

 

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(समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार)

 

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June 4, 2007

चिट्ठियां रही हैं हमेशा मेरे घर में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:51 am

 

rajendra upadhyay

राजेन्द्र उपाध्याय की एक कविता

 

 

चिट्ठियां

 

चिट्ठियां रही हैं हमेशा मेरे घर में

लोहे के एक तार से बंधी हुई

 

चिट्ठियों से झांकते हैं चेहरे

ससुराल में दुख पा रही बहनों के

दो-दो बेटों के बाप बन गए दोस्तों के

खुश-खुश फूल बांटती हुई लड़कियों के

चिट्ठियों से झांकते हैं दुख गहरे

आंसू    अवसाद    विषाद

करुणा समाई हुई चिट्ठियों में

तार बंधी हुई चिट्ठियों में ।

 

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( समकाली सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

June 1, 2007

स्त्रीवग्गो

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 6:23 am

ऋतुराज की एक कविता

 

 

स्त्रीवग्गो

 

रात्रि विश्राम से पहले चलते-चलते जहां रुकना होगा

वह चाहेगी कि मैं उसे पूरी कथा सुनाऊं

 

अंधेरा घिर जाने से पहले भोजन बन जाना चाहिए

बिस्तर सजने पर पालथी मार कर बैठना होगा

फिर कथा कहनी होगी अपने अनगिनत भटकावों की

एक दिन का पूरा वृत्तांत लोगों से छिपते हुए

सुनाना होगा सिर्फ़ एक श्रोता स्त्री को

कहने होंगे निद्रा से पहले के सभी स्वप्न

जिनमें वह गायब होगी

 

जेतवन में बात फैल चुकी है कि शास्ता थके-हारे

रात्रि विश्राम के लिए रुके हैं

और एक स्त्री को स्त्री होने का विशेषाधिकार

मिलने वाला है

 

कुटिया के बाहर भीड़ बढती जा रही है

दीपक बुझा दो देवी मैं अंधेरे में ही फुसफुसाते हुए

तुम्हें मुक्तिमार्ग का ज्ञान दूंगा

यह इतना नीरस उपक्रम है कि शायद तुम ऊंघने लगो

मैं तुम्हारे दोनों कंधों का स्पर्श कर तुम्हें जगाता रहूंगा

किसी न किसी तरह यह महारात्रि व्यतीत हो ही जाएगी ।

 

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