अनहद नाद

July 31, 2007

शुभा की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:10 am

एकालाप

 

क्या नष्ट किया जा रहा है

यह दृश्य है जो खत्म हो रहा है

या मेरी नज़र

ये मेरी आवाज़ खत्म हो रही है

या गूंज पैदा करने वाले दबाव

 

आत्मजगत मिट रहा है या वस्तुजगत

 

कौन देख सकता है भला इस

मक्खी की भनभनाहट

इसकी बेचैन उड़ान

 

कौन तड़प सकता है

संवाद के लिए और उसके

बनने तक कौन कर सकता है

एकालाप ।

 

********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय‘ अंक से साभार )

 

July 30, 2007

राजकिशोर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:53 am

 

साथ

 

तुम्हारी साड़ी की किनारी लाल है

अरे, मैंने पहली बार देखा आज

मैं तो इसके पीले फूलों का

आदी हो चला था

 

यह लो

तुम्हारे कुछ बाल सफ़ेद हो चले

पीछे की ओर

जूड़े के नीचे

 

और यह कनपटी के पास

हल्की-सी कालिमा

बिलकुल ताज़ा तो नहीं लगती

फ़िर यह कल तक कहां थी

जबकि यह मेरे प्यार करने की

प्रिय जगहों में है

 

जब बाहर इतना कुछ नहीं देख पाया

तो भीतर

पता नहीं कितना कुछ जमा होगा

इन पंद्रह-बीस वर्षों में

मेरे दृष्टि-पथ से परे

 

उफ़, मैं तुम्हारे साथ नहीं

तो किसके साथ रह रहा था ।

 

******

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

July 27, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:37 am

 

कभी पाना मुझे

 

तुम अभी आग ही आग

मैं बुझता चिराग

 

हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से

पकड़ता एक किरण का स्पन्द

पानी पर लिखता एक छंद

बनाता एक आभा-चित्र

 

और डूब जाता अतल में

एक सीपी में बंद

 

कभी पाना मुझे

सदियों बाद

दो गोलार्धों के बीच

झूमते एक मोती में ।

 

*******

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय‘ अंक से साभार )

 

July 26, 2007

शिक्षक महोदय

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:12 am

अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता

 

शिक्षक महोदय

 

मेरे इस विश्लेषण को आप क्षमा करें

एक रोज़ भाषा का प्रयोग था

आश्विन के आसमान की तरह

उसके बाद, क्षमा करना

शिथिल फाल्गुन से कृष्णचूड़ा की तरह

झड़ गये हैं तीन दशक

 

मेरा यौवन बह गया

क्लास रूम से बरामदे के बीच

मेरी प्रौढता ने झुक कर

उस टूटे चॉक के टुकड़े को उठा लिया

संस्कारसिक्त आंखों से देखता रहा किताब

हाज़िरी का खाता और कलम की भंगिमा

 

क्षमा करना  यदि आज़ भी

फागुन की आसन्न हवाओं में

मैं याद रखूं एक व्याकरणविहीन कविता

पूरे विश्लेषण के आदि से अंत तक यदि

सत्तर के दशक से आज भी चली आए एक कविता

गूंगी   एकाकी   टूटी-फूटी ।

 

*******

 

( अनुवाद : सुमना मजूमदार; पुनरीक्षण : प्रियंकर )

 

July 25, 2007

न देने के लिये

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:38 am

{ कल इस बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया था,प्रस्तुत है इसी कविता का एक और अनुवाद ताकि आप दोनों अनुवादों की तुलना कर सकें. कृपया बताएं कि आपको कौन-सा अनुवाद अधिक पसंद आया और क्यों . अनुवादक-पुनरीक्षक वही हैं }

 

अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता

( अनुवाद: सुमना मजूमदार; पुनरीक्षण: प्रियंकर )

 

न देने के लिये

 

तुम पर मायावी देह का

 सौन्दर्य निछावर कर दूंगा

तुम्हारे आंचल में छोड़ जाऊंगा

जादू भरे तेजस्वी प्राण

 

कुहासे को चीर कर आई भोर

नन्हीं बच्ची की तरह

छोटे-छोटे हाथों से

इस भोर ने

नदी को आगोश में ले लिया

–  पूरे बंगाल की भोर ने

 

इस भोर की तरह

लजीला करुण प्रेम

छोड़ जाऊंगा मैं

तुम्हारी भावनाओं में

– उसके बाद सूरज बड़ा होगा

 

एक रोज़ भोर खत्म नहीं होगी

एक रोज़ सूरज नहीं ढलेगा

एक रोज़ बिटिया के दिल में

खिल उठेगी आकाश की हंसी ।

 

**********

 

( काव्य संकलन ‘कल्पना एबंग एकाकीर किंबदंती’ से साभार )

July 24, 2007

न देने के वास्ते

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:47 am

 

अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता

( अनुवाद: सुमना मजूमदार; पुनरीक्षण: प्रियंकर )

 

न देने के वास्ते

 

तुम पर निछावर कर दूंगा

मायावी देह का सौन्दर्य

तुम्हारे आंचल में छोड़ जाऊंगा

जादू भरे तेजस्वी प्राण

 

कुहासे को चीर कर आई भोर

नन्हीं बच्ची की तरह छोटे-छोटे हाथों से

इस भोर ने –  पूरे बंगाल की भोर ने

नदी को आगोश में ले लिया

 

इस भोर की तरह

लजीला करुण प्रेम

छोड़ जाऊंगा मैं

तुम्हारी भावनाओं में

– उसके बाद सूरज बड़ा होगा

 

एक रोज़ भोर खत्म नहीं होगी

एक रोज़ सूरज नहीं ढलेगा

एक रोज़ बिटिया के दिल में

खिल उठेगी आकाश की हंसी ।

 

**********

 

( काव्य संकलन ‘कल्पना एबंग एकाकीर किंबदंती’ से साभार )

July 23, 2007

विनय दुबे की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:45 am

 

मैं तो कविता लिखता हूं

 

मैं जब कविता लिखता हूं

तो भूख को भूख लिखता हूं

विचार या विचारधारा नहीं लिखता

 

मैं जब कविता लिखता हूं

और कविता में तितली लिखता हूं

तो तितली को तितली लिखता हूं

विचार या विचारधारा नहीं लिखता

 

मैं जब कविता लिखता हूं

और कविता में स्त्री लिखता हूं

तो स्त्री को स्त्री लिखता हूं

विचार या विचारधारा नहीं लिखता

 

विचार या विचारधारा के बारे में

महासचिव प्रगतिशील लेखक संघ और

महासचिव जनवादी लेखक संघ से बातें करें

मैं तो कविता लिखता हूं ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

July 22, 2007

एक पड़ोसी की प्रार्थना में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:17 am

 

विनोद कुमार शुक्ल की  कविता -  ॥2॥

 

जब बाढ़ आती है

तो टीले पर बसा घर भी

डूब जाने को होता है

पास, पड़ोस भी रह रहा है

मैं घर को इस समय धाम कहता हूं

और ईश्वर  की प्रार्थना में  नहीं

एक पड़ोसी की प्रार्थना में

अपनी बसावट में आस्तिक हो रहा हूं

कि किसी अंतिम पड़ोस से

एक पड़ोसी बहुत दूर से

सबको उबारने

एक डोंगी लेकर चल पड़ा है

 

घर के ऊपर चढाई पर

मंदिर की तरह एक और पड़ोसी का घर है

 

घर में दुख की बाढ़ आती है ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

July 20, 2007

विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:37 am

 

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

 

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

और एक नया शुरू होकर

नया अधूरा छूट जाता

शुरू से इतने सारे

कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते

 

परंतु इस असमाप्त –

अधूरे से भरे जीवन को

पूरा माना जाए, अधूरा नहीं

कि जीवन को भरपूर जिया गया

 

इस भरपूर जीवन में

मृत्यु के ठीक पहले भी मैं

एक नई कविता शुरू कर सकता हूं

मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह

जीवन की अपनी पहली कविता की तरह

 

किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।

 

********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

July 19, 2007

नदी के आगे सिजदा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:57 am

ज्योतिर्मय दास की एक बांग्ला कविता

 

नदी के आगे सिजदा

 

नदी से हमें कुछ सीख लेनी थी

देखा जाय तो यह अटूट प्रवहमयता ही जीवन है

दोनों किनारे नए अन्न की धारावाहिकता

जीवन को आगे बढने की –  प्रवाहित होने की मंत्रणा देती है

एक महान जीवन के प्रवाहित होने से

जमा हुआ अंधकार समाप्त होगा

बह जाएंगे अज्ञान के घास-फूस …

नदी का अर्थ है नवीनता और धारावाहिकता

और नवीनता का दूसरा नाम है जीवन

इसलिए फ़ुरसत हो तो

नदी के आगे सिजदा करना बेहतर है !

 

**********

 

( बांग्ला लघु पत्रिका हवा ४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर  केन्द्रित अंक ‘अधुनान्तिक बांग्ला कविता’ से साभार )

Older Posts »

Blog at WordPress.com.