अटपटा छंद
प्रियंकर की एक अपेक्षाकृत ताज़ा कविता
अटपटा छंद
भारतवर्ष उदय
भारतीयता अस्त
रोयां-रोयां कर्जजाल में
नेता-नागर मस्त
ब्रह्मज्ञानी बिरहमन
इश्क-दीवाना दरवेश
बाज़ार का बाना
साधू का वेश
जनेऊ से कमर का खुजाना
मोरछल से लोबान का उड़ाना
मोबाइल पर नए क्लाइंट से बतियाना
जगत सत्यं ब्रह्म मिथ्या
घृतम पिवेत ऋणम कृत्वा
उधार प्रेम का फ़ेवीकोल
बीच बाज़ारे हल्ला बोल
द ग्रेट इंडियन शादी-बाज़ार
कन्या में डर
माथे पर प्राइस टैग
सजे-धजे वर
बनी की अंखियां सुरमेदानी
बनी का बाप कुबेर
थाम हाथ में स्वर्ण-पादुका
दूल्हे को ले घेर
नदिया गहरी
नाव पुरानी
बरसे पैसा
नाच मोरी रानी
बीच भंवर में बाड़ी
बाड़ी में बाज़ार
चौराहे पर चारपाई
आंगन में व्यापार
अपलम-चपलम गाड़ी
बैकसीट पर प्यार
माया ठगिनी रूप हज़ार
लंपट तेरी जयजयकार
आजा मेरे सप्पमपाट
मैं तनै चाटूं तू मनै चाट
देवल चिने अजुध्या नगरी
मन का मंदिर सूना
घट-घट वासी राम के
अंतर को दुख दूना ।
**********
मस्त हैं.. आधुनिक दोहे..
Comment by अभय तिवारी — July 4, 2007 @ 9:31 am
ताजगी से भीगी, आल्हादित कर देने वाली!
Comment by मैथिली — July 4, 2007 @ 10:31 am
प्रियंकर की कविता
अटपटा छन्द
बाजार है तेज
भाव हुये मन्द!
Comment by Gyandutt Pandey — July 4, 2007 @ 11:28 am
अनेकों संदेश देती सुन्दर क्षणिकाओं की टोकरी. वाह!! बहुत बढ़िया लगा.
Comment by समीर लाल — July 4, 2007 @ 12:35 pm
आनन्द आया , पहले भी यहाँ के चक्कर लगाता था पर आज तो आप कुछ और ही रंग में रमें दिखे।
Comment by बोधिसत्व — July 4, 2007 @ 2:43 pm
बेहतरीन लगे
ये अटपटे छंद
सघन अर्थों से संगुफित
व्यंग्य से बुझे पैने शब्द
हाइकुओं-से लड़ित
Comment by सृजन शिल्पी — July 5, 2007 @ 9:38 am
यह मूड बार-बार आवे ।
Comment by afloo — July 6, 2007 @ 3:47 am