अनहद नाद

July 6, 2007

पूछती है मेरी बेटी

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दिनेश कुशवाह की एक कविता

 

पूछती है मेरी बेटी

 

जनक बहुत कुछ जानते थे सीते !

जैसे कि हल की मुठिया थामे बिना राजा

नहीं समझ सकता दुख प्रजा का

 

कि क्या होती है पोषिता कन्या

पोषिता कुमारी ?

कितना कठिन है उसका जीवन-निर्वाह

 

इसलिए पिता विदेह ने

तुम्हें स्वयंवरा बनाया

कि स्वयं वर

बल-बुद्धि-संयम शील युक्त वर

पर रख दी शंभु-धनु-भंजन की शर्त

 

अपनी अमूल्य धरोहर दांव पर लगाकर भी

पिता निश्चिंत होना चाहता है

कहती है मेरी पत्नी

एक लड़की का पिता होकर ही

जाना जा सकता है

बहुत कुछ कर सकने की सामर्थ्य

और कुछ न कर पाने की मजबूरी को

 

पूछती है मेरी बेटी

पापा! समय ने तुममें और जनक में

कोई फ़र्क किया है क्या ?

और सोचता हूं मैं

एक वन से दूसरे वन जाना

वन-वन रोना ही नियति है क्यों

आज भी हमारी बेटियों की ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

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