तिल का ताड़, झूलता झोपड़ा और सुनहला पहाड़
उर्फ़ जाना जीवन से आनंद का ……..
सो एक आभासी मित्र सशरीर अवतरित हुए . आदमी का आदमी से मिलना और खुश होना अपने आप में एक रूमान है . हम भी थोड़ा- बहुत रूमानी हुए . हुए इसलिए कि आजकल होना पड़ता है .जीवन में सहज रूमान बचा कहां है . कहां गम्भीरता का लहराता अगम-अगाध सागर और उस पर गरजते- घहराते सिनिसिज़्म के बादल और कहां रूमान का सूचिका-संधान . यह बेमौसम बरसात थी . एकदम गलत टाइमिंग . पर जीवन में टाइमिंग, टाइम-सैटिंग या कहूं जितने भी तरह की सैटिंग हो सकती है,ठीक रखी होती तो फिर यह ब्लॉगरी ही रह गई थी करने को .
सो एक मित्र अवतरित हुए . हम रूमानी हुए . रूमान की तरंग में कुछ लिख मारा . पढ़कर कुछ मित्र हमसे भी ज्यादा रूमानी हुए . इतने हुए कि भाव-विभोर हो गए . न जाने क्या-क्या अटरम-सटरम लिख मारा . आगमनकारी मित्र के सुनाम और सम्पर्क, जिसे आज की ‘पारलेंस’ में नेटवर्किंग भी कहा जाता है, का ही सुपरिणाम रहा होगा वरना अपना रूमान-रोग या रोगी-रूमान इतना संक्रामक कहां .
पर कुछ रूमान-विरोधी गंभीर मित्र बहुत नाराज़ हुए . लानतें भेजी . दो साधारण आदमियों के चिरकुटीय किस्म के मिलन को रूमान के घिस्से मार कर इतना चमकाने के लिए थू-थू की . अब उन्हें कौन समझाए कि ब्रासो रगड़ने और चमकाने के बाद भी पीतल, पीतल ही रहता है सोना थोड़े ही हो जाता है . ऊपरी दुष्ट मन कुनमुनाया कि सीधे नारद के सुपरस्टार को शिकायत लिख भेजो ताकि वे इनके पीछे अपने अनुयाइयों की हल्ला-बोल मंडली उर्फ़ तुनतुनिया ब्रिगेड को लगा दें . या फिर डायरेक्ट अविनाश या राहुल को सुपारी दे दो . पर समस्या यह है कि ये रूमान-विरोधी गंभीर-सिनिकल जीव इतने प्यारे लोग हैं कि लगभग अपना आत्मरूप लगते हैं . अब अपने आप से दुश्मनी कौन मोल ले .
मेरी समस्या यह है कि मुझे स्माइली लगाना नहीं आता और इनकी समस्या यह है कि ये या तो पोस्ट के नीचे का नोट नहीं पढते या इनकी फ़ुल-टाइम गंभीरता का इरेज़र उस स्माइली को इरेज़ करता चलता है . सुपरस्टार कहना तारीफ़ करना भी होता है और जिम्मेदार ठहराना भी . सुपरस्टार कहना सीधा प्रशस्तिगान भी हो सकता है , वक्रोक्ति भी और व्याजस्तुति भी . पर जो भी है या हो सकता है , है स्माइली के साथ . और इसे स्माइली के साथ ही पढा जाना चाहिए . अच्छा यह लगा कि अधिकांश ने इसे स्माइली के साथ पढा भी . पर गुरु-गंभीर लोग प्रचलित पथ पर नहीं चलते . सायर,सिंह,सपूत की परम्परा में वे लीक छोड़कर चलते हैं . नए मार्ग इसी तरह से बनते हैं . कई बार तो वे प्रचलित मार्ग से ज्यादा दुर्गम और बीहड़ होते हैं . पर होते हैं नए .
तो साहेबान! तिल का ताड़ बनाने.. झूलते झोंपड़े का ताज़महल और सुनहला पहाड़ बनाने का दोषी हूं . बुखार सच में अभी तक उतरा नहीं लगता है . भावुकता में नहाया सिलबिल प्रजाति का जीव और इस विराट भूमंडलीय बाज़ार का बचा हुआ अनबिका ‘लास्ट रिजेक्टेड पीस’ हूं .
जयपुर में मेरे एक मित्र हैं . कॉलेज के जमाने के मित्र . मित्र तो स्कूल-कॉलेज के जमाने के ही होते हैं,बाद में तो शायद धरम-धक्के के तहत आस-पास धकेल दिए गए लोगों की ‘वर्केबल’ व्यवस्था ही होती दिखती है ( सिनिसिज़्म के सागर में दो-चार गोते मुझे भी मारने दीजिए) . तो मेरे मित्र पं० हरिकिशन शर्मा उर्फ़ वकील साहब की प्लास्टिक थर्मोवेयर्स की एजेंसी है जिसे तीन भाई हरिकिशन,अशोक और राजीव उर्फ़ राजू मिल कर चलाते हैं . कोई सामान जो बहुत दिनों से पड़ा होता है और बिकता नहीं है उसे वे ‘ब्लॉक्ड आइटम’ या ‘ब्लॉक आइटम’ कहते हैं . राजू से मैंने इस शब्द का सर्वथा मौलिक उपयोग सीखा . जो व्यक्ति उसे पसंद नहीं आता था, या आलतू-फ़ालतू या फर्जी टाइप का लगता था, मुझे ’भोला आदमी’ समझ कर उस व्यक्ति के बारे में पूर्व-सूचना प्रदान करते हुए राजू के चेतावनी भरे शब्द होते थे, “गुरु जी! ऊंसे दूर रहो ‘ब्लॉक आइटम ‘ है .” इस शब्द में उसने कितने और कैसे-कैसे अर्थ-आरोपित कर रखे थे उनमें से कुछ को मैं समझ पाता था और कुछ को नहीं . पर राजू की सूझ-बूझ को सराहता था और कुछ अपने भी अर्थ आरोपित करता था .मुझे इसमें ‘मानसिक अवरोध’ या ‘मेंटल ब्लॉक’ की भी ध्वनि तरंगित होती प्रतीत होती थी .
मैं बहुत खराब रसोइया हूं . मेरी दाल हमेशा ज्यादा पक जाती है (दाल गल जाती है नहीं कहूंगा वरना और ही अर्थ-छवि उठने लगेगी). खाली रसोइया क्या, मैं सब-कुछ ही गड़बड हूं . राजू की शब्दावली में मैं एक ‘ब्लॉक आइटम’ हूं . पर सुधीजनो! आप तो इस चलायमान दुनिया के ‘चलेबल’ बल्कि ‘दौड़ेबल’ लोग हैं, आप ‘ब्लॉक आइटम’ क्यों बनना चाहते हैं . चलिए थोड़ा रूमानी हो जाएं .
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नोट : स्माइली की एक खेप या लदनी यहीं पड़ी है . चाहनवारे मन-माफ़िक ‘व्यवहार’ कर सकते हैं .