Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 12, 2007

तिल का ताड़, झूलता झोपड़ा और सुनहला पहाड़

उर्फ़ जाना जीवन से आनंद का ……..

सो एक आभासी मित्र सशरीर अवतरित हुए . आदमी का आदमी से मिलना और खुश होना अपने आप में एक रूमान है . हम भी थोड़ा- बहुत रूमानी हुए . हुए इसलिए कि  आजकल होना पड़ता है .जीवन में सहज रूमान बचा कहां है . कहां गम्भीरता का लहराता अगम-अगाध सागर और उस पर  गरजते- घहराते सिनिसिज़्म के बादल और कहां रूमान  का सूचिका-संधान . यह बेमौसम बरसात थी . एकदम गलत टाइमिंग . पर जीवन में टाइमिंग, टाइम-सैटिंग  या कहूं जितने भी तरह की सैटिंग हो सकती है,ठीक रखी होती तो फिर यह ब्लॉगरी ही रह गई थी करने को .

सो एक मित्र अवतरित हुए . हम रूमानी हुए .  रूमान की तरंग में कुछ लिख मारा . पढ़कर कुछ मित्र हमसे भी ज्यादा रूमानी हुए . इतने हुए कि भाव-विभोर हो गए . न जाने क्या-क्या अटरम-सटरम लिख मारा . आगमनकारी मित्र के सुनाम और सम्पर्क, जिसे आज की ‘पारलेंस’ में नेटवर्किंग भी कहा जाता है, का ही सुपरिणाम रहा होगा वरना अपना रूमान-रोग या रोगी-रूमान इतना संक्रामक कहां .

पर कुछ रूमान-विरोधी गंभीर मित्र बहुत नाराज़ हुए . लानतें भेजी . दो साधारण आदमियों के चिरकुटीय किस्म के मिलन को रूमान के घिस्से मार कर इतना चमकाने के लिए थू-थू की . अब उन्हें कौन समझाए कि ब्रासो रगड़ने और चमकाने के बाद भी पीतल, पीतल ही रहता है सोना थोड़े ही हो जाता है . ऊपरी दुष्ट मन कुनमुनाया   कि सीधे नारद के सुपरस्टार को शिकायत लिख भेजो ताकि वे इनके पीछे अपने अनुयाइयों की हल्ला-बोल मंडली  उर्फ़ तुनतुनिया ब्रिगेड  को लगा दें . या फिर डायरेक्ट अविनाश या राहुल को सुपारी दे  दो . पर  समस्या यह है कि ये रूमान-विरोधी गंभीर-सिनिकल जीव  इतने प्यारे लोग हैं कि लगभग अपना आत्मरूप लगते हैं .  अब अपने आप से दुश्मनी कौन मोल ले .

मेरी समस्या यह है कि मुझे स्माइली लगाना नहीं आता और इनकी समस्या यह है कि ये या तो पोस्ट के नीचे का नोट नहीं पढते या इनकी फ़ुल-टाइम गंभीरता का इरेज़र उस स्माइली को इरेज़ करता चलता है . सुपरस्टार कहना तारीफ़ करना भी होता है और जिम्मेदार ठहराना भी . सुपरस्टार कहना सीधा प्रशस्तिगान भी हो सकता है ,  वक्रोक्ति भी और व्याजस्तुति भी . पर जो भी है या हो सकता है , है स्माइली के साथ . और इसे स्माइली के साथ ही पढा जाना चाहिए . अच्छा यह लगा कि अधिकांश ने इसे स्माइली के साथ पढा भी . पर गुरु-गंभीर लोग प्रचलित पथ पर नहीं चलते . सायर,सिंह,सपूत की परम्परा में वे लीक छोड़कर चलते हैं . नए मार्ग इसी तरह से बनते हैं . कई बार तो वे प्रचलित मार्ग से ज्यादा दुर्गम और बीहड़ होते हैं . पर होते हैं नए .

तो साहेबान! तिल का ताड़ बनाने.. झूलते झोंपड़े का ताज़महल और सुनहला पहाड़ बनाने का दोषी हूं .  बुखार सच में अभी तक उतरा नहीं लगता है . भावुकता में नहाया सिलबिल प्रजाति का जीव और  इस विराट भूमंडलीय बाज़ार  का बचा हुआ अनबिका ‘लास्ट रिजेक्टेड पीस’  हूं .

जयपुर में मेरे एक मित्र हैं . कॉलेज के जमाने के मित्र . मित्र तो स्कूल-कॉलेज के जमाने के ही होते हैं,बाद में तो शायद धरम-धक्के के तहत आस-पास धकेल दिए गए लोगों की ‘वर्केबल’ व्यवस्था ही होती दिखती है ( सिनिसिज़्म के सागर में दो-चार गोते मुझे भी मारने दीजिए) . तो मेरे मित्र पं० हरिकिशन शर्मा उर्फ़ वकील साहब की प्लास्टिक थर्मोवेयर्स की एजेंसी है जिसे तीन भाई हरिकिशन,अशोक और राजीव उर्फ़ राजू मिल कर चलाते हैं . कोई सामान जो बहुत दिनों से पड़ा होता है और बिकता नहीं है उसे वे ‘ब्लॉक्ड आइटम’ या ‘ब्लॉक आइटम’ कहते हैं . राजू से मैंने इस शब्द का सर्वथा मौलिक उपयोग सीखा . जो व्यक्ति उसे पसंद नहीं आता था, या आलतू-फ़ालतू या फर्जी टाइप का लगता था, मुझे ’भोला आदमी’ समझ कर उस व्यक्ति के बारे में पूर्व-सूचना प्रदान करते हुए राजू के चेतावनी भरे शब्द होते थे, “गुरु जी! ऊंसे दूर रहो ‘ब्लॉक आइटम ‘ है .”  इस शब्द में उसने कितने और कैसे-कैसे अर्थ-आरोपित कर रखे थे उनमें से कुछ को मैं समझ पाता था और कुछ को नहीं . पर राजू की सूझ-बूझ को सराहता था और कुछ अपने भी अर्थ आरोपित करता था .मुझे इसमें ‘मानसिक अवरोध’ या ‘मेंटल ब्लॉक’ की भी ध्वनि तरंगित होती प्रतीत होती थी .

मैं बहुत खराब रसोइया हूं . मेरी दाल हमेशा ज्यादा पक जाती है (दाल गल जाती है नहीं कहूंगा वरना और ही अर्थ-छवि उठने लगेगी). खाली रसोइया क्या, मैं सब-कुछ ही गड़बड हूं . राजू की शब्दावली में मैं एक ‘ब्लॉक आइटम’ हूं . पर सुधीजनो! आप तो इस चलायमान दुनिया के ‘चलेबल’  बल्कि     ‘दौड़ेबल’   लोग हैं, आप ‘ब्लॉक आइटम’ क्यों बनना चाहते हैं . चलिए थोड़ा रूमानी हो जाएं .

*************

नोट : स्माइली की एक खेप या लदनी यहीं पड़ी है . चाहनवारे मन-माफ़िक ‘व्यवहार’ कर सकते हैं .

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Responses

  1. स्माइली लगा के पढ़ लिये हैं जी ..दाल अच्छी थी..आपकी दाल आजकल गलने लगी!! :-)

  2. बढ़िया है ये “ब्लॉक आईटम” – पोस्ट बिलकुल खतम (finished – सन्दर्भ बप्पी लाहिड़ी) पोस्ट है! :)

  3. काशी विश्वविद्यालय के बिड़ला छात्रावास में बिजली के हीटर पर घण्टों पकने वाली दाल पर गोरख पान्डे ने कहा था,’दाल गल रही है,
    या देश गल रहा है’।

  4. मेरा सुझाव है कि आप अनहद नाद पर गद्य भी नियमित रूप से लिखें।
    .
    .
    पिछली बार की तरह…इस बार भी पोस्ट फायरफाक्स पर ठीक नही दिख रही।

  5. हम ने तो पहले ही गलती मान ली थी कि ब्लॉग की दुनिया में आकर सूक्ष्म चीज़ें उपेक्षा का शिकार होती हैं और कुछ का कुछ पढ़ी जाती हैं.. ये गलतियां बडे़ बड़े कर बैठते हैं.. इस बार मुझ छोटे से भी हो गई.. पर गलती के लिए आपने क्लास ली सही किया.. आगे से लीक पकड़ कर भी चलना सीखेंगे.. ब्लॉक आइटम बनने का अपना कोई इरादा नहीं.. हम तो ब्लॉग आइटम बनना चाहते हैं.. :)

  6. दाल पकाने से बाज नहीं आएंगे आप? ठकुरई दिखानी ही पड़ेगी क्‍या?..

  7. पढ़ के तो नहीं लगा कि आप खराब रसोइया हैं। अच्छा पकाया है।

  8. बढ़िया तो है. स्माईली की खेप किनारे ही रहने दें. इसे तो बिना स्माईली ही चलायें. गंभीर बात में कैसी स्माईली.
    आराम से कहें-दाल गल गई है. हमें तो स्वादिष्ट लगी.

  9. भाई दाल तो अच्छी दली है आपने.आप जल्दी से ठीक हॊ जाइये हम आप के अच्छॆ पढनिहार हैं.

  10. जितने ब्लाग आइटम हैं, वे सब असल में ब्लॉक आइटम हैं

  11. बढ़िया है। ये मौज-मजे, नोक-झोंक चलते रहने चाहिये। जब कुछ नहीं होता तो यही ्रगड़-घसड़ आगे कुछ होने वाली घटनाऒं की कड़ी बनती है। पिछले लेख में जो बात कहनी रह गयी थी वह अब लिख रहा हूं कि आपका गद्य एकदम कविता की तरह प्रवाह मान है। लिखना जारी रखें। :)


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