
जीवन वृत्तांत
उठाया ही था पहला कौर
कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और
पहुंचा ही था खेत में पानी
कि छप्पर में आग लगी,बिटिया चिल्लानी
आरंभ ही किया था गीत का बोल
कि ढोलकिया के अनुसार फूट गया ढोल
घी का था बर्तन और गोबर की घानी
चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी
मित्रों ने मेहनत से बनाई ऐसी छवि
चटक और दबावदार कविता का कवि
एक हाथ जोड़ा तो टूट गया डेढ़ हाथ
यही सारा जीवन वृत्तांत रहा दीनानाथ !
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
अष्टभुजा सही चलते हैं.. अच्छा है.
By: प्रमोद सिंह on July 13, 2007
at 8:49 am
सीधे सरल शब्दों में कहा गया गूढ वॄत्तांत… अच्छी लगी कविता…
By: manya on July 13, 2007
at 8:49 am
बताइये बन्दा आठ हाथ से लिख रहा है फिर भी इतनी शिकायत..और आठ हाथ से लिखेगा तो जमेगी कैसे नहीं..
By: अभय तिवारी on July 13, 2007
at 8:59 am
बहुत अच्छी कविता है भाई.
By: Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2007
at 9:58 am
बहुत ख़ूब योगेश जी. जुर्माना लगेगा.
By: Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2007
at 10:00 am
अष्टभुजा जी अब बाहर से भीतर जा रहे हैं। अच्छा लग रहा है। ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ वाला यह अंतरंग स्वर उनके ‘चटक और दबावदार’तेवर से मिलकर लोकप्रियता और अंतर्वस्तु का एक नया संगम रचे, यही कामना है।
By: CHANDRABHUSHAN on July 13, 2007
at 10:42 am
हा हा! मजेदार..
By: Manish on July 13, 2007
at 11:24 am
बढिया है।
By: paramjitbali on July 13, 2007
at 1:32 pm
बढ़िया रहा यह अंदाज भी अष्टभुजा जी की कविताई का.
By: समीर लाल on July 13, 2007
at 2:08 pm
अष्टभुजा मेरे प्रिय कवि हैं । उनकी कविताएं पढ़कर हमेशा भला-भला सा महसूस होता है और आज भी हुआ ।
By: yunus on July 14, 2007
at 4:08 am