अनहद नाद

July 13, 2007

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 7:40 am

अष्टठ??जा शुक्ल

जीवन वृत्तांत

 

उठाया ही था पहला कौर

कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और

 

पहुंचा ही था खेत में पानी

कि छप्पर में आग लगी,बिटिया चिल्लानी

 

आरंभ ही किया था गीत का बोल

कि ढोलकिया के अनुसार फूट गया ढोल

 

घी का था बर्तन और गोबर की घानी

चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी

 

मित्रों ने मेहनत से बनाई ऐसी छवि

चटक और दबावदार कविता का कवि

 

एक हाथ जोड़ा तो टूट गया डेढ़ हाथ

यही सारा जीवन वृत्तांत रहा दीनानाथ !

 

**********

 

( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

10 Comments »

  1. अष्‍टभुजा सही चलते हैं.. अच्‍छा है.

    Comment by प्रमोद सिंह — July 13, 2007 @ 8:49 am

  2. सीधे सरल शब्दों में कहा गया गूढ वॄत्तांत… अच्छी लगी कविता…

    Comment by manya — July 13, 2007 @ 8:49 am

  3. बताइये बन्दा आठ हाथ से लिख रहा है फिर भी इतनी शिकायत..और आठ हाथ से लिखेगा तो जमेगी कैसे नहीं..

    Comment by अभय तिवारी — July 13, 2007 @ 8:59 am

  4. बहुत अच्छी कविता है भाई.

    Comment by Isht Deo Sankrityaayan — July 13, 2007 @ 9:58 am

  5. बहुत ख़ूब योगेश जी. जुर्माना लगेगा.

    Comment by Isht Deo Sankrityaayan — July 13, 2007 @ 10:00 am

  6. अष्टभुजा जी अब बाहर से भीतर जा रहे हैं। अच्छा लग रहा है। ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ वाला यह अंतरंग स्वर उनके ‘चटक और दबावदार’तेवर से मिलकर लोकप्रियता और अंतर्वस्तु का एक नया संगम रचे, यही कामना है।

    Comment by CHANDRABHUSHAN — July 13, 2007 @ 10:42 am

  7. हा हा! मजेदार..

    Comment by Manish — July 13, 2007 @ 11:24 am

  8. बढिया है।

    Comment by paramjitbali — July 13, 2007 @ 1:32 pm

  9. बढ़िया रहा यह अंदाज भी अष्‍टभुजा जी की कविताई का.

    Comment by समीर लाल — July 13, 2007 @ 2:08 pm

  10. अष्टभुजा मेरे प्रिय कवि हैं । उनकी कविताएं पढ़कर हमेशा भला-भला सा महसूस होता है और आज भी हुआ ।

    Comment by yunus — July 14, 2007 @ 4:08 am

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