अनहद नाद

July 17, 2007

वृक्ष वे कविताएं हैं ….

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:45 am

खलील जिब्रान का गद्य-काव्य

 

वृक्ष वे कविताएं हैं,जिन्हें धरती आसमान पर लिखती है! हम उन्हें गिरा देते हैं और उनका कागज़ के रूप में परिवर्तन कर देते हैं,ताकि अपनी रिक्तता को उस पर अंकित कर सकें .

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यदि मुझे कविता लिखने की शक्ति या अलिखित कविता के आनंद में से कोई एक चुनने के लिए कहा जाय तो मैं आनंद को चुन लूंगा . वस्तुतः वह अधिक सुंदर कविता है .

परंतु तुम और मेरे समस्त पड़ोसी एकमत हो कि मैं सदा ही बुरी वस्तु ही पसंद करता हूं .

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केवल अभिव्यक्त अभिमत ही कविता नहीं है,प्रत्युत वह एक गीत है जो सस्मित मुख से प्रवाहित होता है .

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कवि उस सिंहासन-च्युत अधिपति के समान है,जो अपने महलों की राख में बैठा उसमें से एक काल्पनिक महल बनाने का प्रयत्न करता है .

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कविता प्रसाद,पीड़ा और आश्चर्य  का समझौता है,जिसे लिखने के लिए शब्दकोश पर आश्रित रहना पड़ता है .

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कविता के लिए ‘विचार करना’ सबसे भारी अवरोधक है .

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महान गायक वह है, जो हमारे मौन भावों को गा सके . 

 

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खलील जिब्रान (1883-1931) : विश्वविख्यात लेखक,कवि,चित्रकार और दार्शनिक . सीरिया के माउंट लेबनान प्रांत में जन्म .  अरबी और अंग्रेज़ी में लेखन . ‘दि प्रोफ़ेट’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है . बलिष्ठ कल्पना-शक्ति के कवि खलील जिब्रान गद्य-काव्य की एक नई शैली के उन्नायक थे . वे उस परम्परा के कवि थे जिससे सूफ़ी-संत-मनीषी और ज्ञानी जन आते हैं .

3 Comments »

  1. मुझे तो यह वाला पसन्द आया:
    कविता के लिए ‘विचार करना’ सबसे भारी अवरोधक है .

    Comment by ज्ञानदत्त पाण्डेय — July 17, 2007 @ 12:37 pm

  2. और मुझे आखिरी वाला—महान गायक वो है जो हमारे मौनभावों को गा सके ।

    Comment by yunus — July 17, 2007 @ 1:23 pm

  3. ज्ञानजी और यूनुस भाई!
    कविता आधी कवि के पास होती है और आधी पाठक-श्रोता के पास . पूरी कविता तभी बनती है,काव्यालोचन की भाषा में कहें तो साधारणीकरण या रसानुभूति तभी होती है, जब दोनों छोर मिल जाते हैं. एकमेक हो जाते हैं . आप दोनों दूसरा छोर मज़बूती से थामे हुए हैं .

    Comment by प्रियंकर — July 19, 2007 @ 9:55 am

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