बोधिसत्व की एक कविता
त्रिलोचन
‘सुनने में आया, हैं बीमार त्रिलोचन
हरिद्वार में पड़े हैं, अपने बेटे के पास
जिनका कविता-फ़विता से कोई
लेना-देना नहीं है। टूट गई है जीभ, जो मन सो
बकते से हैं, जसम-फ़सम, जलेस-प्रलेस सब
सकते में हैं’
खबर सुनाई जिसने कवि-अध्यापक वह
इलाहाबाद-अवध में चर्चा है व्यापक कह
मौन हुआ, मैं रहा देखता उसका मुंह
रात बहुत थी काली, जम्हाता अंगुली
पटकाता वह फिर बोला –
‘सूतो अब तुम भी’
मैंने मन ही मन कहा –
‘त्रिलोचन घनी छांव वाला तरुवर है
मूतो अब तुम भी’
उस पर विचार के नाम पर
दुर-दुर करो, कहो वाम पर
धब्बा है त्रिलोचन
कहो त्रिलोचन कलंक है।
भूल जाओ कि वह जनपद का कवि है
गूंज रहा है उसके स्वर से दिग-दिगंत है।
मरने दो उसको दूर देश में पतझड़ में
तुम सब चहको भड़ुओं तुम्हारा तो
हर दिन बसंत है।
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अपने त्रिलोचन जी आज की हिंदी के शिखर कवि त्रिलोचन का जन्म 20 अगस्त 1917 को चिरानीपट्टी, कटघरापट्टी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। अंग्रेजी में एम.ए.पूर्वार्ध तक की पढ़ाई बीएचयू से । इनकी दर्जनों कृतियाँ प्रकाशित हैं जिनमें धरती(1945), गुलाब और बुलबुल(1956), दिगंत(1957), ताप के ताए हुए दिन(1980), शव्द(1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981) अरधान (1984), तुम्हें सौंपता हूँ( 1985) काफी महत्व रखती हैं। इनका अमोला नाम का एक और महत्वपूर्ण संग्रह है। त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह राजकमल प्रकाशन से छप चुका है। वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह के शव्दों में “उनका जितना प्रकाशित है उतना या कदाचित उससे अधिक ही अप्रकाशित है”।हिंदी में सॉनेट जैसी काव्य विधा को स्थापित करने का श्रेय मात्र त्रिलोचन को ही जाता है। आप त्रिलोचन को आत्मपरकता कवि भी मान सकते हैं। ‘भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल’ जैसी आत्मपरक पंक्तियाँ त्रिलोचन ही लिख सकते हैं। परंतु ऐसा नहीं है कि त्रिलोचन का काव्य संसार केवल आत्मपरकता तक ही सीमित है। शब्दों का सजग प्रयोग त्रिलोचन की भाषा का प्राण है । – बोधिसत्व
ये त्रिलोचन कौन है?
By: paramjitbali on जुलाई 18, 2007
at 8:37 पूर्वाह्न
चिट्ठे पर त्रिलोचन पर कविता छपेगी तब यह सवाल भी सुनना पडेगा |
By: अफ़लातून on जुलाई 18, 2007
at 8:56 पूर्वाह्न
हो सके तो त्रिलोचन जी का परिचय छाप दें।
कविता छापने के लिए धन्यवाद
By: बोधिसत्व on जुलाई 18, 2007
at 10:35 पूर्वाह्न
प्रिय भाई परमजीत जी,
दुख यह नहीं है कि आप त्रिलोचन को नहीं जानते . दुख यह है कि आप हिंदी में कविता लिखते हैं और त्रिलोचन को नहीं जानते . आपसे क्या कहूं ? बस यही कि गलती मेरी है . हम जिस तरह के समाज में रहते हैं उसमें कवि का परिचय भी दिया जाना ज़रूरी है .
By: प्रियंकर on जुलाई 18, 2007
at 11:01 पूर्वाह्न
प्रियंकर जी, अब परिचय भी मिल गया और कविता भी। उस के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद। जहाँ तक मेरी बात है कि मै त्रिलोचन जी के बारे मे नही जानता, उसका मुझे भी खेद है।
By: paramjitbali on जुलाई 18, 2007
at 11:18 पूर्वाह्न
ये दुर्भाग्य है कि हिंदी ब्लॉगिंग में कविता-कहानी करने वाले कई लोग त्रिलोचन को नहीं जानते।
By: अविनाश on जुलाई 18, 2007
at 11:45 पूर्वाह्न
समय ही बलवान होता है. महाभारत का महानतम एक बहेलिये के तीर से गया था अकेले, जंगल में.
By: ज्ञानदत्त पाण्डेय on जुलाई 18, 2007
at 12:39 अपराह्न
यह हुआ न संजाल का कमाल
आप ने बहुत अच्छा किया यह कविता छाप कर ।
हो सकेगा तो त्रिलोचन पर लिखी अपनी पहली कविता भी चढ़ाउंगा।
By: बोधिसत्व on जुलाई 18, 2007
at 2:21 अपराह्न
[...] प्रियंकर जी के चिट्ठे पर एक मासूम सा सवाल उठा “ये त्रिलोचन [...]
By: त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें. « हम भी हैं लाइन में on जुलाई 19, 2007
at 5:26 पूर्वाह्न
बोधि की कविता हिन्दी समाज की विचित्रताओं की एक बानगी है..
By: अभय तिवारी on जुलाई 19, 2007
at 6:01 पूर्वाह्न
अच्छी कविता है।
By: अनूप शुक्ल on जुलाई 19, 2007
at 5:42 अपराह्न
[...] प्रियंकर जी के चिट्ठे पर एक मासूम सा सवाल उठा “ये त्रिलोचन [...]
By: त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें. on सितम्बर 10, 2007
at 11:55 पूर्वाह्न
pujya dada ji……………
By: abhishek singh on दिसम्बर 21, 2010
at 3:31 अपराह्न
[...] अन्य साईटों में विस्तृत त्रिलोचन : अनहद नाद में , चंद्रभूषण के पहलू में , सृजनगाथा में , [...]
By: त्रिलोचन : किवदन्ती पुरूष | संजीव तिवारी . . Sanjeeva Tiwari .. Chhattisgarh on फ़रवरी 14, 2011
at 9:20 पूर्वाह्न