अनहद नाद

July 19, 2007

नदी के आगे सिजदा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:57 am

ज्योतिर्मय दास की एक बांग्ला कविता

 

नदी के आगे सिजदा

 

नदी से हमें कुछ सीख लेनी थी

देखा जाय तो यह अटूट प्रवहमयता ही जीवन है

दोनों किनारे नए अन्न की धारावाहिकता

जीवन को आगे बढने की –  प्रवाहित होने की मंत्रणा देती है

एक महान जीवन के प्रवाहित होने से

जमा हुआ अंधकार समाप्त होगा

बह जाएंगे अज्ञान के घास-फूस …

नदी का अर्थ है नवीनता और धारावाहिकता

और नवीनता का दूसरा नाम है जीवन

इसलिए फ़ुरसत हो तो

नदी के आगे सिजदा करना बेहतर है !

 

**********

 

( बांग्ला लघु पत्रिका हवा ४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर  केन्द्रित अंक ‘अधुनान्तिक बांग्ला कविता’ से साभार )

7 Comments »

  1. अनुवाद किसका है। अच्छी कविता है ।

    Comment by बोधिसत्व — July 19, 2007 @ 7:57 am

  2. अनुवाद कवि का है . उससे थोड़ी-बहुत छेड़खानी खाकसार ने की है .

    Comment by प्रियंकर — July 19, 2007 @ 9:42 am

  3. प्रियंकर जी, अनुवादित रचना के भाव बहुत सुन्दर है_नदी से हमें कुछ सीख लेनी थी

    देखा जाय तो यह अटूट प्रवहमयता ही जीवन है

    दोनों किनारे नए अन्न की धारावाहिकता

    जीवन को आगे बढने की – प्रवाहित होने की मंत्रणा देती है

    Comment by paramjitbali — July 19, 2007 @ 11:24 am

  4. कविता अच्छी है और अनुवाद भी जीवंत.

    Comment by Isht Deo Sankrityaayan — July 19, 2007 @ 12:55 pm

  5. त्रिलोचन ने गजलें और चतुश्पदियाँ भी ख़ूब लिखी हैं. हो सके तो कुछ उनमें से भी लाएं .

    Comment by Isht Deo Sankrityaayan — July 19, 2007 @ 12:59 pm

  6. ‘खाकसार’ जी की अनुवाद से छेड़खानी अच्छी है।

    Comment by अनूप शुक्ल — July 19, 2007 @ 5:40 pm

  7. बहुत सुन्दर अनुवाद लगा. ओरिजिनल कविता तो पढ़ी नहीं है.

    Comment by समीर लाल — July 19, 2007 @ 6:34 pm

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.